सोमवार, 31 मई 2010

बापू जी आये सपने में.....और बोले...



बापूजी ने निभाया सपने मे दिया वचन!

गुजरात मे बलसाड़ है ,

वहा की एक बहेन ने बताया कि उस बहेन को संतान नही थी..

इसलिए वो बहेन बहोत दुखी रहती थी..

बार बार बापूजी को प्रार्थना करती तो एक दिन बापूजी ने सपने मे आकर कहा कि ६ जनवरी को बलसाड़ मे आना ,

तुमको प्रसाद दूंगा…तो ४,५,६ और ७ जनवरी को बलसाड़ मे बापूजी का सत्संग था…

वो बहेन ६ तारीख को बलसाड़ पहुंची ,

लेकिन बहोत भीड़ थी…तो बहेन ने सोचा बापूजी तो प्रसाद देनेवाले है इतनी भीड़ मे कैसे मिलेगा …

इसलिए वो बहेन जहा से बापूजी की गाड़ी आती जाती उस रास्ते मे खड़ी हो गयी..

वहा भी बहोत भीड़ थी…लेकिन जब बापूजी की कार उस बहेन के पास आई

तो कार रोक के बापूजी ने उस बहेन को प्रसाद दिया और ..

बापूजी बोले कि , “मिल गया प्रसाद..! वचन पुरा किया ना ?

अब निश्चिंत रहो..सब ठीक हो जाएगा..! “



वो बहेन अत्यंत प्रसन्न हो गयी …बिल्कुल घटित घटना है…!

जब भगवान मे श्रध्दा दृढ़ होती है तो भगवान दूर नही होते!

(सुरेशानंद जी महाराज एक प्यारासा भजन गा रहे है -”रूचि रूचि भोग लगाओ मेरे मोहन….”)

उस बहेन का सदगुरूदेव के प्रति गहरी श्रध्दा है,

भगवान से प्रेम है तो बापूजी का प्रसाद उसे मिला …

साधक की श्रध्दा प्रेम होता है तो भगवान का मार्गदर्शन जरुर मिलता ही है..!

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suresh bapji k satsang se......28/10/2007
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वाह मेरे बापू .....आपकी लीला निराली..

हमे तो है आप पर भरोसा.......

दुनिया को हो न हो....

हमे दुनिया से मतलब नही...

हमे तो मोहब्बत है आपसे.....

हमे दुनिया से क्या लेना देना ......

जो भरोसा करेगा मेरे बापू पे.....

वो अपनी जिन्दगी बनाएगा....

और जो न करेगा ....वो अपना समय गवायेगा ...

इसलिए विनती है हाथ जोर के.....

एक बार आके देखो बापू के दर पे मालूम पर जायेगा आपको...

अर्जी हमारी है ....मर्ज़ी आपकी है

जय हो ...

हरिओम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्

रविवार, 30 मई 2010

मंगलवार की चतुर्थी 1st Jun'2010




इन तिथियों पर जप/ध्यान करने का वैसा ही हजारों गुना फल होता है जैसा की सूर्य/चन्द्र ग्रहण में जप/ध्यान करने से होता है:

१. सोमवती अमावस्या - (15thMarch'10, 9thAug'10 )

२. रविवार को सप्तमी हो जाए. (21stFeb'10, 7thMar'10, 4thJul'10, 12thDec'10)

३. मंगलवार की चतुर्थी हो जाए.(19thJan'10, 1st Jun'10, 2ndFeb'10)

४. बुधवार की अष्टमी हो जाए. (15thSept'10)

इन तिथियों पर जप/ध्यान का फल ग्रहण के समय किये ही जप/ध्यान के सामान होता है.

इसलिए हमें इन तिथियों पर जादा जप करना चाहिए, जिस से हमें थोडे में ही जादा लाभ मिले

BAPUJI K SATSANG PARVACHAN SE....

HARIOM....

आसक्ति मिटाने के ७ उपाय ...




सुरेशानन्द जी ने आसक्ति मिटाने के ७ उपाय बताये जो कि इस प्रकार है
आसक्ति मिटाने के ७ सरल उपाय हैं

१- दृढ निश्चय कर लिया जाये कि जो गुरुजी कहेंगे वो मुझे करना ही है बस।

२- वासना पूर्ति के मार्ग में चलने वालों का हम संग नही करेंगे। चाहे कोई भी क्युं न हो, वासना पूर्ति के मार्ग में जो जा रहे है उनकी दोस्ती नही करेंगे।

३- कभी भी हम लोग ऐसा विचार नही करेंगे कि वासना पूर्ति करने वाले लोग सुखी है। बडे बंगले में रहते है , बडी कार में घूमते हैं, खाक सुखी है सुखी वो है भगवान कृष्ण ने गीता में बताया हैं काम के वेग को और क्रोध के वेग को सहन करते की शक्ति रखता है दम रखता है भगवान कहता है कि बो मेरे मत में सुखी है, "सहयोगी सहसुखी नरः" आप गीता में पढिये ५वे अध्याय में, भगवान नें यह नही कहा है कि काम विकार नही आयेगा क्रोध विकार आयेगा ही नही, लोभ कभी आयेगा ही नही, भगवान ने कहा कि काम का वेग क्रोध का वेग, इस वेग में जो बह नही जाता उसको सहन करने का दम अपने पास रखता है, भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि वो मेरे मत में सुखी है और मेरे मत में वो योगी है।

४- अपने भोजन में पवित्रता सदैव रखी जाये। लहसुन प्याज निश्चित ही तमो गुण बढाने वाली चीजें है परन्तु कोई बुजुर्ग है किसी को शारीरिक कोई तकलीफ़ है, खाँसी की तकलीफ़ है या श्वास की बिमारी है वो अगर आदमी थोडा लहसुन, प्याज खा ले तो उसको कोई पाप नही लगेगा, घुटने का दर्द रहता है किसी को, वात प्रकोप रहता है न वायु का तो शरीर में दर्द रहता है घुटनों में कमर में तो किसी को ऐसा दर्द हो घुटनों आदि में तो वह औषधवश लहसुन खा सकता है, अंगेजी दवाई खाये इससे तो अच्छा है की वो थोडी सी हरी लहसुन खा ले, इसका मतलब से नही कि जो जवान है वो लोग सोचे कि हम भी लहसुन प्याज खाये हा शारीरिक तकलीफ़ है तो ठीक है। लोग बडे कमाल के है शरीर का नाश हो ऐसी चीज नही खाते है लेकिन बुद्धि नाश हो जाये ऐसी चीज पैसे देकर खाते हैं। इसलिये भगवत गीता के ६ठे अध्याय से १७वे श्लोक में और १७वें अध्याय से ८वे, ९वे, और १०वे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार सम्बन्धी बहुत बढिया बातें बताई है।

५- अपने जीवन में स्थान की पवित्रता रखी जाये, ऐसी जगह में न जाये जहाँ जाने से रजोगुण बढे और तमो गुण बढे। ऐसी जगह जाने में आग्रह रखें जहाँ जाने से सत्व गुण बढें, भक्ति बढें, भगवान के नाम में रुचि बढें।

६- कभी भी अपना समय बेकार की मेगजीन पढ्ने में, बेकार की टीवी सीरीयल देखने में, बेकार की बातों में न गँवाया जायें। समय मिल गया तो माला से या मन से जप शुरु कर दिया जाय। जप हो गया तो सत्संग की कोई पुस्तक पढी जाय। वो भी पढ ली तो शान्त बैठे और श्वास बाहर-भीतर जाये उस पर जप किया जाये,

७- भगवान कपिल बताते है माता देवहूति को कि माँ आसक्ति निश्चित रूप से दुखः देने वाली है परन्तु वही आसक्ति अगर भगवान और भगवत्प्राप्त गुरु में होती है तो वो तारने वाली होती हैं।

स्रोत: स्वामी सुरेशानन्द जी वीसीडी भाग ४ व ५ - पूर्णिमा दर्शन रोहिणी (दिल्ली

शुक्रवार, 28 मई 2010

लफंगों के मेले




माँ हितैषी है उससे भी बच्चों को नफरत हो जाती है,

बाप से नफरत हो जाती है।


लोफरों से प्रीति होने लगती है तो समझो, छोरों का सत्यानाश है !


ऐसे ही परमात्मा से तो प्रेम नहीं है

और मनचले विकारों के साथ हम हो गये।


गुरु और ईश्वर या शास्त्र की बात में तो विश्वास नहीं,




उस पर चलते नहीं और काम, क्रोध, लोभ, मोह –

ये वृत्तियाँ जैसा बोलती हैं ऐसा ही हम करने लगे,


इसीलिए दुःख मिटता नहीं सुख टिकता नहीं।

नहीं तो सुखस्वरूप आत्मा है, फिर भी मनुष्य दुःखी !


और वह दाता..... दया करने में उसके पास कमी नहीं,

दूरी नहीं, देर नहीं, परे नहीं, पराया नहीं।

माँ परायी है क्या ?

फिर भी जब लोफरों की दोस्ती में आ गये

तो माँ ही परायी लग रही है, पिता ही पराये लग रहे हैं।

लफंगों के मेले में आ गये तो माँ बाप अपने नहीं लगते,

वे लफंगे ही अपने लगते हैं।

ऐसे ही अपन लोग भी लफंगों की दोस्ती में आ गये कि

'जरा इतन कर लूँ, जरा ऐसा कर लूँ....' मनचाही...

अब लफंगों के कहने से बचने के लिए क्या करें ?

कोई-न-कोई कसम खा लो कि भई !

इतनी लफंगों की बात नहीं मानूँगा

और इतनी माँ-बाप और सदगुरु की मानूँगा।

हितैषियों के पक्ष में थोड़ा निर्णय करो और

लफंगों के पक्ष के निर्णय तुरंत न करो,

जल्दी अमल में न लाओ, उनमें कटौती करते जाओ

– यही उपाय है।

तो खा लोगे कसम ?

कि हम आवाराओं की सब बातें नहीं मानेंगे।

माँ-बाप और संत हमारे हितैषी हैं,

उनकी बात मानेंगे। संत भी माई-बाप होते हैं।

तो रात को सोते समय भगवान का सुमिरन करके फिर सोना

और सुबह उठो तो चिंतन करो कि

'हम आवाराओं के प्रभाव में नहीं रहेंगे,

अब प्रभु तेरे प्रभाव में रहेंगे।

तू सम है, तू शांत है, तू नित्य है, सुख-दुःख अनित्य हैं।


हम अनित्य से प्रभावित नहीं होंगे,


नित्य की स्मृति नहीं छोड़ेंगे।


वाह-वाह !' तो दुःख के कितने भी पहाड़ आ जायें,


आप उनके सिर पर पैर रखकर ऊपर होते जाओगे।

जो जितना विघ्न बाधा और मुसीबतों से जूझते हुए

ऊपर जाता है

वह उतना महान हो जाता है।



bapuji k satsang parvachan se....


wah bapu wah ...........

aapka samjana ek dum nirala.......


mera jogi nirala...

wah sai wah.......

jai ho....

सोमवार, 24 मई 2010

४ बातें


सुरेशानान्द्जी ने सत्संग में बताया कि गोपियाँ भगवान् कृष्ण से प्रार्थना करती ठी

कि प्रभु! हम आपकी ४ बातें न भूलें -

अ। आप का दर्शन

ब। आप के वचन

क। आप के साथ बिताया हुआ समय

डी। आप का मधुर हास्य

तो गुरुदेव ने भी कहा कि हम भी यह ४ बातें न भूलें…(



गुरुदेव का) दर्शन,

उनके वचन,

उनके साथ बिताया हुआ समय

और मधुर हास्य…


PUJYA SHRI K SATSANG PARVACHAN SE....
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हरिओम,नारायण नारायण, नारायण नारायण

रविवार, 23 मई 2010

आशाराम बापू की एक प्राइवेट बात .....




सदगुरूदेव परम पूज्य संत श्री आसाराम बापूजी की अमृतवाणी :-
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अपने पे बीती एक प्राइवेट बात बताऊ ?

भक्तगण बोले हा....

बापूजी बोले...

मेरे बेटे कि माँ और मेरी माँ की बहु मेरी कौन लगती….

आप समझ गए होंगे….

…तो बेचारी की तबियत जरा बुढापे से हल्की हो गयी .

.मेरे को पता चला तो मैंने इंटरकोम पे बात की… फिर ये वो बताने लगी ….

तो मैंने बोला कि , “दो दिन से ये ये लिया थोडा फायदा है तो धीरज रखो .

.क्या होगा….हिम्मत करेगी ठीक हो जाएगा… ऐऽऽ हैऽऽऽऽऽ

बोलो मेरे साथ “

.. .तो वोह बोली … “आइ हई ” (कराहते हुए..)

फिर मैंने बोला , ” इतना सत्संग सुनती हो…जानती हो कि आत्मा अमर है ,

दुःख आया तो शरीर मे आया उसके लिए क्या कराहना ..

जरा प्यार से बोलो .. ऐऽऽ हैऽऽऽऽऽ
.. तो वह थोडी ख़ुशी से बोली , “आइ हैऽऽऽऽऽ “

मैंने और बोला , “शाबास ! …

दवाई ली है , ठीक हो जायेगी…हमारे में भी देवत्व है …

सच्चे गुरु की चेली है … और प्रेम से बोलो ..

और थोडा और थोडा… तो ऐईईईईईईइ हैईईईईईईईईई हा हा हः हः हः

आगरा आश्रम सत्संग २००७ .................

( बापूजी खूब हँसाये सभी को….. धन्य है सदगुरूदेव भगवान की !

अपने संतान रूपी भक्तगणो के चेहरे पे मुस्कान लाने के लिए कैसे कैसे किस्से बताते है…!

वाह मेरे बापू......

अपनी प्राइवेट बात तक हमको समझाने के लिए बताते हो....

और हम नादान फिर भी समझ नही पाते....

धन्यवाद है बापूजी आपको....

दे दो मुझे भी ऐसा ज्ञान ....

बस गाऊ तेरा नाम ......जय बापू आशाराम

सदगुरूदेव की जय हो!!!!!)






hariom

शनिवार, 22 मई 2010

एक करोड़ रुपिया दूंगा ..(बापूजी सत्संग )




दुःख क्यों आता है

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बेवकूफी और बे -इमानी के बिना दुखी होकर दिखाए :-

मेरा मेरा जानने की बेवकूफी की तभी दुःख होता है

…जो छूटने वाला है उसको अपना मानते हो ,

मेरा मेरा जानते हो वो चला गया इसलिये दुःख है …

बे -इमान बनो तभी दुखी हो सकते हो..

समता से रहोगे – सुख दुःख आता जाता है लेकिन सच्चिदानंद सदा साथ है ऐसा जानोगे तो

दुःख नही होगा ..

ऐसी समता से दुःख का रोना रो के दिखाओ एक करोड़ रुपिया दूंगा ..

बेवकूफी और बे -इमानी से ही दुःख होता है

…बिल्कुल सीधा गणित है …

बेवकूफी और बे -इमानी किए बिना दुःख का रोना रोके दिखाओ ,

एक करोड़ रुपिया देता हु …:-)

..इतना सत्संग सुनने के बाद भी दुःख से छूटते नही तो बेवकूफी है …

”जी महाराज ” कर के सत्संग सुनते है तो बेवकूफ ही रहोगे ..

सुख दुःख से ऊपर उठाने के लिए ,

समता लाने के लिए समझ और पुरुषार्थ की जरुरत है ..

जब तक आत्मा को नही जाना तब तक दुखो से घिरो रहोगे ..

सत् -चित – आनंद रुपाय ….नारायण हरी ….

सत्संग से जो ज्ञान मिलता है वो धन से ,

दान से , पुण्य से , देवी देवता से , सत्ता से , बल से

..किसी से नही मिलता ….सच्चे भक्त बनो

और अपने गुरू महाराज को पहचानो ..

सिर्फ़ “जी महाराज ” नही …

नारायण हरी ..ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ..


बापूजी के सत्संग परवचन से....

कितना सरल समझाते हो मेरे बापू .....

हम नादान फिर भी समझ नही पाते...

वाह बापू वाह....

आपकी लीला निराली ...

जय हो ...

हरिओम

कमल हिरानी ,दुबई

बुधवार, 19 मई 2010

झूमे देश-विदेश है .....







1.गुरु ही ब्रह्मा ,गुरु ही विष्णु ,गुरु ही देव-महेश है
रूप दिखे मानव सा उनका, पर सचमुच वे ईश है

2.कृपा मिले जिसको सदगुरू की,पाना नही कुछ शेष है
पाकर कृपा प्रसादी गुरु की ,साधक बने गणेश है

3.सेवा करता मात-पिता की,ज्यो वो उमा महेश है
हिन् भाव मिट जाये स्वत ही,चिंता रहे न लेश है
रूप दिखे मानव सा उनका, पर सचमुच वे ईश है

4.मंगलमय सब होने लगता,बदल जाये परिवेश है..
गमनागमन का क्रम है छुटे,व्यापे राग न द्वेष है
रूप दिखे मानव सा उनका, पर सचमुच वे ईश है

5.लगा जिसे गुरु-भक्ति का चस्का,दूर न उससे ईश है
होने लगते चमत्कार है,मिलती कृपा विशेष है
रूप दिखे मानव सा उनका, पर सचमुच वे ईश है

6.ताली बजा कराते कीर्तन,झूमे देश-विदेश है
है जीना उसी का जीना,जिस पर गुरु-आशीष है

रूप दिखे मानव सा उनका, पर सचमुच वे ईश है ....

मंगलवार, 18 मई 2010

महाराष्ट्र: मात्र देवों भव पित्र देवों भव




सत्संग सुनते समय यह सिद्धान्त ले कर सुनना है

कि हम जो सुनेंगे उसे अपने आचरण में लायेगें

बस शास्त्रों मे लिखा है कि

मात्र देवों भव पित्र देवों भव

तैतरिय उपनिषद मे लिखा है ये वचन,

महाराष्ट्र का पुण्डलीक नाम का विद्यार्थी उसने ये वचन सुना

और अपने माता-पिता की सेवा की तो

भगवान उसके आगे प्रकट हो गये

और उनकी याद में अभी भी उस जगह पर मन्दिर बना हुआ है

आज की तारीक में भी है वो मन्दिर पण्डरपुर महाराष्ट्र में।

शास्त्र का वचन उसने माना,

मातृ देवों भव: पितृ देवों भव:

तो उसको शक्ति प्राप्त हो गयी भगवान प्रकट हो गये।

तो शास्त्रों के वचन माननें से,

गुरु के वचन मानने से साधक को शक्ति प्राप्त होती है।

सिद्धि प्राप्त होती है।

हमारे देश में जितने लोग सुबह सुबह अखबार पढ़ते है

उतने लोग यदि भागवत गीता पढ़ने लग जाये ,

यौवन सुरक्षा जैसी पुस्तकें पड़ने लग जायें,

सुबह सुबह ईश्वर की ओर पढ़े


तो हमारा देश कितना उन्नत हो सकता है।

देशवासी कितने उन्नत हो सकते है।


जितना समय फिल्म के गीत सुनने में या गपशप में जात है

उतना समय यदि शान्त बैठे तो,

ध्यान करे तो, कितना उन्नत हो सकते है।


जितनी शक्ति क्रोध करने में खर्च होती है

उतनी शक्ति को अगर हम बचायें गुस्सा ना करें


तो ध्यान लग सकता है।


पर लोगों को पता नही बेचारे अपनी शक्ति खर्च कर देते है,


जितनी शक्ति आखों के द्वारा फ़िल्म देखने में खर्च कर देते है,


उतनी शक्ति को अगर हम बचायें तो ध्यान लग सकता है,


शक्ति खर्च कर देते है फिर अगर बैठे भी ध्यान पर


तो नींद आ जाती है। इसलिये अपनी शक्ति को बचाना सींखे।

bapuji ke satsang parvachan se.....

wah sai wah.....



kitna accha sochte hai bapu ji humare liye.....



her baat main humara he bhala sochte ho mere sai....



teri kesi lila hai mere sai.....



ek chothi si baat main kitne kaam ki baat bata di aapne....



wah mere sai wah aapki jitni tarif karo kam hai.....



waah baapu waah......



jai ho......



hariom..

k.hirani

सोमवार, 17 मई 2010

हे बापू मुझे कुछ ऐसा बना दे,





हे बापू मुझे कुछ ऐसा बना दे,

इक सच्चे भक्त जैसा बना दे,

हर पल ध्यान रहे तेरा ही,

हर पल तुझे रिझाऊं बापू जी,

किसी की ना परवाह करूं मैं,

केवल बापू ही बापू कहूँ मैं,

जीवन के सभी कर्तव्य निभाऊं मैं,

पर इनमें डूब न जाऊं मैं,

सभी कर्म निभाऊं मैं,

इक पल न तुम्हे भुलाऊं मैं~~

मेरी ये है प्रार्थना प्रभु आप के चरणों में,

दासी की ये है अरदास पभु आप के चरणों में,

क्या प्रभु ये संभव नहीं?

पर आप के लिए कुछ भी असंभव नहीं~~~

शनिवार, 15 मई 2010

दिल से .........





1..इतने सुख मेरे बापू तुने दिए ....

माना की इन सुखों के काबिल नहीं हूँ मैं ...

हर दुःख में तुने साथ न छोरा...

माना की तेरे साथ के काबिल नहीं हूँ मैं ...




2.तेरी कृपा की छाया मैं बेठी रहू ....

बस इतनी कृपा करना मेरे बापू...

इन चरणों मैं परा रहने दे मुझे ...

माना की इन चरणों के काबिल नहीं हूँ मैं. ..


3.तू ही बता कैसे पाऊ तुजसे तुझी को बापू ....

भटक न जाऊ यह डर है मुझे ...

हाथ पकर-कर राह दिखा दो बापू ...

माना की इस राह पे चलने के काबिल नहीं हूँ मैं ...


4.अब तो शमा कर मेरे गुनाह मेरे बापू ........

हर फैसला तुझ पर छोरा है ...

जान बुझ कर अंजान न बन तू मेरे बापू ...

माना के तेरी माफ़ी के काबिल नहीं हूँ मैं ...





HARIOM

k.hirani

गुरुवार, 13 मई 2010

अदभुत रही मौनमंदिर की साधना

!

"परम पूज्य सदगुरूदेव की कृपा से मुझे दिनांक १८ से २४ मई १९९९ तक अमदावाद आश्रम के मौनमंदिर में साधना करने का सुअवसर मिला | मौनमंदिर में साधना के पाँचवें दिन यानी २२ मई की रात्रि को लगभग २ बजे नींद में ही मुझे एक झटका लगा |

लेटे रहने कि स्थिति में ही मुझे महसूस हुआ कि कोई अदृश्य शक्ति मुझे ऊपर... बहुत ऊपर उड़ाये ले जा रही है | ऊपर उड़ते हुए जब मैंने नीचे झाँककर देखा तो अपने शरीर को उसी मौनमंदिर में चित्त लेटा हुआ, बेखबर सोता हुआ पाया | ऊपर जहाँ मुझे ले जाया गया वहाँ अलग ही छटा थी... अजीब और अवर्णीय !

आकाश को भी भेदकर मुझे ऐसे स्थान पर पहुँचाया गया था जहाँ चारों तरफ कोहरा-ही-कोहरा था, जैसे, शीशे की छत पर ओस फैली हो ! इतने में देखता हूँ कि एक सभा लगी है, बिना शरीर की, केवल आकृतियों की | जैसे रेखाओं से मनुष्यरूपी आकृतियाँ बनी हों | यह सब क्या चल रहा था... समझ से परे था | कुछ पल के बाद वे आकृतियाँ स्पष्ट होने लगी |

देवी-देवताओं के पुंज के मध्य शीर्ष में एक उच्च आसन पर साक्षात बापूजी शंकर भगवान बने हुए कैलास पर्वत पर विराजमान थे और देवी-देवता कतार में हाथ बाँधे खड़े थे | मैं मूक-सा होकर अपलक नेत्रों से उन्हें देखता ही रहा, फिर मंत्रमुग्ध हो उनके चरणों में गिर पड़ा |

प्रातः के ४ बजे थे | अहा ! मन और शरीर हल्का-फ़ुल्का लग रहा था ! यही स्थिति २४ मई की मध्यरात्रि में भी दोहरायी गयी | दूसरे दिन सुबह पता चला कि आज तो बाहर निकलने का दिन है यानी रविवार २५ मई की सुबह |

बाहर निकलने पर भावभरा हृदय, गदगद कंठ और आखों में आँसू ! यों लग रहा था कि जैसे निजधाम से बेघर किया जा रहा हूँ |

धन्य है वह भूमि, मौनमंदिर में साधना की वह व्यवस्था, जहां से परम आनंद के सागर में डूबने की कुंजी मिलती है !

जी करता है, भगवान ऐसा अवसर फिर से लायें जिससे कि उसी मौनमंदिर में पुनः आंतरिक आनंद का रसपान कर पाऊँ |"

-इन्द्रनारायण शाह,
१०३, रतनदीप-२, निराला नगर, कानपुर

हरि ॐ,
नारायण नारायण नारायण नारायण

कैसेट का चमत्कार ..........

"व्यापार उधारी में चले जाने से मैं हताश हो गया था एवं अपनी जिंदगी से तंग आकर आत्महत्या करने की बात सोचने लगा था | मुझे साधु-महात्माओं व समाज के लोगों से घृणा-सी हो गयी थी | धर्म व समाज से मेरा विश्वास उठ चुका था |

एक दिन मेरी साली बापूजी के सत्संग की दो कैसेटें 'विधि का विधान' एवं 'आखिर कब तक ?' ले आयी और उसने मुझे सुनने के लिए कहा |

उसके कई प्रयास के बाद भी मैंने वे कैसेटें नहीं सुनीं एवं मन-ही-मन उन्हें 'ढ़ोंग' कहकर कैसेटों के डिब्बे में डाल दिया | मन इतना परेशान था कि रात को नींद आना बंद हो गयी थी | एक रात फ़िल्मी गाना सुनने का मन हुआ |

अँधेरा होने की वजह से कैसेटे पहचान न सका और गलती से बापूजी के सत्संग की कैसेट हाथ में आ गयी | मैंने उसीको सुनना शुरू किया |

फिर क्या था ? मेरी आशा बँधने लगी | मन शाँत होने लगा | धीरे-धीरे सारी पीड़ाएँ दूर होती चली गयीं | मेरे जीवन में रोशनी-ही-रोशनी हो गयी |

फिर तो मैंने पूज्य बापूजी के सत्संग की कई कैसेटें सुनीं और सबको सुनायीं | तदनंतर मैंने गाजियाबाद में बापूजी से दीक्षा भी ग्रहण की | व्यापार की उधारी भी चुकता हो गयी |

बापूजी की कृपा से अब मुझे कोई दुःख नहीं है | हे गुरूदेव ! बस, एक आप ही मेरे होकर रहें और मैं आपका ही होकर रहूँ |"

-ओमप्रकाश बजाज,
दिल्ली रोड़, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश

मीठा आम ........

एक सेठ के हाथ में एक गुलदस्ता था।

उसने उसे एक संत को दे दिया।

संत गुलदस्ता देखने लगे।

उसमें प्रत्येक फूल को देखकर वे प्रसन्न हुए

और उसकी सुगन्ध की प्रशंसा करने लगे।

सेठ सोचने लगा कि 'महाराज तो गुलदस्ते में ही मग्न हो गये,

देने वाले की ओर देखते तक नहीं।'

बड़ी देर हुई तो सेठ से रहा नहीं गया।

उसने कहाः "स्वामी जी !

जरा मेरी ओर भी देखिये। मुझे आपसे कुछ जानना है।"

सेठ की बात सुनकर संत ने गुलदस्ता रख दिया और बोलेः "सेठ जी !

यह तो मैं दृष्टांत दे रहा था।

सेठों का भी सेठ परमात्मा है और ये सांसारिक पदार्थ हैं

गुलदस्ते के फूल जो उसी ने हमें दिये हैं

किंतु हम इनमें इतने लीन हो गये कि उस दाता की याद ही नहीं आती।"


जैसे स्वप्न की सृष्टि एक काल्पनिक बगीचा है,

उसी प्रकार यह जाग्रत जगत भी मन की कल्पना ही है।

सपने की सृष्टि उस समय सत्य लगती है

परंतु जागने पर कुछ भी नहीं रहता,

वैसे ही आत्मा का ज्ञान होने पर जाग्रत जगत भी स्वप्नवत् हो जाता
है।

संसार में जो कुछ भी सौन्दर्य एवं आनंद दिखायी पड़ती है,

उसका कारण अज्ञान है। शरीर और संसार के पदार्थ नाशवान हैं।

एक आत्मा ही सत्, चित्त और आनंदस्वरूप है।


जब आप आम खाते हो तो आपको वह मीठा लगता है

और समझते हो कि उससे आनंद मिल रहा
है।

यह नासमझी है, अज्ञान है।

आनंद आम से नहीं मिल रहा

अपितु आम खाते समय उसके स्वाद में मन स्थिर हो गया,

चित्तवृत्तियाँ थोड़ी शांत अथवा कम हो गयीं तभी वहाँ से आनंद मिला

अर्थात् आनंद मिला मन के स्थिर होने से।

परंतु यह स्थिरता क्षणिक है।

थोड़ी देर बाद फिर से खटपट शुरू हो जायेगी

और आम खाने की तृष्णा भी बढ़ जायेगी,

मन आपको आम का गुलाम बना देगा।

किंतु जब आत्मरस मिलता है,

भगवद् भक्ति तथा भगवद् ज्ञान का अखूट आनंद मिलता है

तब मन उसमें स्थिर ही अपितु लीन भी हो जाता है।

जब मन थोड़ी देर के लिए आम में स्थिर हुआ तो इतना आनंद मिला,

यदि उस सच्चिदानंद में ही लीन हो जाय तो वह आनंद कैसा होगा !

उसका तो वाणी वर्णन ही नहीं कर सकती।

उसको हम पूरी तरह से शब्दों के द्वारा नहीं समझा सकते।

उसको तो अनुभव के द्वारा ही जान सकते हैं

और उसका अनुभव होता है साधना,

विवेक तथा
वैराग्य द्वारा।

hariom.....

समझ सको तो समझ लो यारों.....








सत्-ता, चेतन-ता, और आनंद-ता, जीवात्मा और परमात्मा को मिलाता है;

और असत-ता, जड़-ता, और दुःख-रुप-ता शरीर और संसार को मिलाती है;

तो शरीर संसार का हिस्सा है और जीवात्मा परमात्मा का अंग है…..

अंग अंग ही से जुदा रहना चाहता है,

मिटटी का धेला पृथ्वी का अंग है,

ज़ोर से फेंको, फिर भी पृथ्वी पर आएगा..

अग्नी सुर्य का अंग है,

दियासलाई जलाओ, सीदी करो तो भी उसकी लौ ऊपर,

और उलटी कर दो,तो भी उसकी लौ ऊपर…

ऐसे ही जीवात्मा सत्, चित और आनंद का अंग है,

इसलिये वोह सदा रहना चाहता है, सब कुछ जानना चाहता है,


और आनंद चाहता है;लेकिन असत, जड़ और दुःख रुप से आनंद चाहता है,

इसलिये मार खाता है और फिर सब छोड़ के मर जाता है…

अगर, सत्संग मिल जाये,थोडा साधन मिल जाये, गुरू-मंत्र मिल जाये,

थोडा ध्यान की रित मिल जाये, तो (गुरुदेव चुटकी बजाते है )

असत का सदुपयोग और सत् का साक्षात्कार. ..दोनो हाथ में लड्डू…!!:)


बापूजी के सत्संग परवचन से...

क्या इसमें कुछ गलत सोचते है मेरे बापू....????????

सबका मंगल सबका भला ...

ऐसी भावना रखते है मेरे बापू..

वाह बापू वाह .....

हम अपने आप को भाग्यशाली समजते है ...

जो हमे आप मिले...

बापू आपकी जय हो....

जपते रहे तेरा नाम ...जय बापू आशाराम ....

हरिओम...


कमल हिरानी...दुबई (यु ऐ ई)

बुधवार, 12 मई 2010

बापूजी दर्शन





पड़ा रहेगा माल खज़ाना...

सदा दिवाली संत कि, आठों पहर आनंद,अकलमता कोई उपजा, गिने इंद्र को रुंक…

तीन टूक कोपीन कि, भाजी बिना लूंण,तुलसी ह्रदय रघुबीर बसे, तो इंद्र बापुडा कुण..


तुम्हारे में वोह ताक़त है कि धरती के राजा जिसके आगे बौने हो जाते हैं,

ऐसा इंद्र तुम्हारे आगे बौना हो जाये, ऐसा सच्चिदानंद का सुख पाने कि ताक़त तुम्हारे में है…

और उस ताकत का उपयोग नहीं करते, फिर भी वोह साथ नहीं छोड़ती …

शरीर साथ देगा नहीं और परमात्मा साथ छोडेगा नहीं …

मरने के बाद शरीर और सम्पदा जिसको अपनी माना, वोह नहीं चलेगा साथ में ,

लेकिन सछिदानंद साथ छोडेगा नहीं…जो कभी साथ न छोडे, उसे बोलते हैं परमात्मा,

और जो सदा साथ न रहे, उसे कहते हैं संसार,जो अपना नहीं है,

वोह तो नहीं है; जिसको अपना मानते हैं वोह भी साथ नहीं रहेगा…(इसलिये)




बहुत पसरा मत करो, कर थोडे कि आश,

बहुत पसार जिन किया, वोह भी गए निराश…


पड़ा रहेगा माल खज़ाना, छोड़ त्रीय सूत जाना है,

कर सत्संग अभी से प्यारे, नहीं तो फिर पछताना है॥


।९। सत्संग से जो विवेक जगता है, सत्संग से जो सच्चे सुख के द्वार खुलते हैं,

वोह दुनिया कि किसी सम्पदा, किसी विद्या से नहीं खुल सकते …

बड़ी भारी तपस्या से भी सत्संग का पुण्य, ज्ञान और विवेक ऊँचा माना गया है …

सत्संग आपका सच्चिदानंद स्वभाव जागृत करता है;

और कुसंग आपके विकारों को भडकाता है…

कर नसिबां वाले सत्संग दो घड़ियाँ…

एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आधतुलसी संगत साध कि, हरे कोटी अपराध…

bapuji ke satsang parvachan se....



स्वामी हमे ना बिसारियो चाहे लाख लोग मिल जाये..हम सम तुमको बहोत है तुम सम हमको नाही..दीनदयाल को बिनती सुनो गरीब नवाज़ …जो हम पूत कपूत है, तो है पिता तेरी लाज..हरि हरि ओम्म्म्म्म …हरि ओम् हरी हरि ॐ……

मंगलवार, 11 मई 2010

दण्डी संन्यासी

संत एकनाथ जी महाराज के पास एक बड़े अदभुत दण्डी संन्यासी आया करते थे।

एकनाथ जी उन्हें बहुत प्यार करते थे। वे संन्यासी ये मंत्र जानते थेः



ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्चयते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

ॐ शांतिः ! शांतिः !! शांतिः !!!




और इसको ठीक से पचा चुके थे। वे पूर्ण का दर्शन करते थे सबमें। कोई भी मिल जाये तो मानसिक प्रणाम कर लेते थे। कभी बाहर से भी दण्डवत् कर लेते थे।

एक बार वे दण्डी संन्यासी बाजार से गुजर रहे थे। रास्ते में कोई गधा मरा हुआ पड़ा था। 'अरे, क्या हुआ ? कैसे मर गया ?' – इस प्रकार की कानाफूसी करते हुए लोग इकट्ठे हो गये। दण्डी संन्यासी की नजर भी मरे हुए गधे पर पड़ी। वे आ गये अपने संन्यासीपने में। 'हे चेतन ! तू सर्वव्यापक है। हे परमात्मा ! तू सबमें बस रहा है। - इस भाव में आकर संन्यासी ने उस गधे को दण्डवत् प्रणाम किये। गधा जिंदा हो गया ! अब इस चमत्कार की बात चारों ओर फैल गयी तो लोग दण्डी संन्यासी के दर्शन हेतु पीछे लग गये। दण्डी संन्यासी एकनाथ जी के पास पहुँचे। उनके दिल में एकनाथ जी के लिए बड़ा आदर था। उन्होंने एकनाथ जी को प्रार्थना कीः "....अब लोग मुझे तंग कर रहे हैं।"



एकनाथ जी बोलेः "फिर आपने गधे को जिन्दा क्यों किया ? करामात करके क्यों दिखायी ?"



संन्यासी ने कहाः "मैंने करामात दिखाने का सोचा भी नहीं था। मैंने तो सबमें एक और एक में सब – इस भाव से दण्डवत किया था। मैंने तो बस मंत्र दोहरा लिया कि 'हे सर्वव्यापक चैतन्य परमात्मा ! तुझे प्रणाम है।' मुझे भी पता नहीं कि गधा कैसे जिंदा हो गया !"



जब पता होता है तो कुछ नहीं होता, जब तुम खो जाते हो तभी कुछ होता है। किसी मरे हुए गधे को जिंदा करना, किसी के मृत बेटे को जिंदा करना – यह सब किया नहीं जाता, हो जाता है। जब अनजाने में चैतन्य तत्त्व के साथ एक हो जाते हैं तो वह कार्य फिर परमात्मा करते हैं। इसी प्रकार संन्यासी अपने चैतन्य के साथ एकाकार हो गये तो वह चमत्कार परमात्मा ने कर दिया, संन्यासी ने वह कार्य नहीं किया।



लोग कहते हैं- 'आसाराम बापूजी ने ऐसा-ऐसा चमत्कार कर दिया।' अरे, आसाराम बापू नहीं करते, जब हम इस वैदिक मंत्र के साथ एकाकार हो कर उसके अर्थ में खो जाते है तो परमात्मा हमारा कार्य कर देते हैं और तुमको लगता है कि बापू जी ने किया। यदि कोई व्यक्ति या साधु-संत ऐसा कहे कि यह मैंने किया है तो समझना कि या तो वह देहलोलुप है या अज्ञानी है। सच्चे संत कभी कुछ नहीं करते।



भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- 'ज्ञानी की दृष्टि उस तत्त्व पर है इसीलिए वे तत्त्व को सार और सत्य समझते हैं। तत्त्व की सत्ता से जो हो रहा है उसे वे खेल समझते हैं।'



हर मनुष्य अपनी-अपनी दृष्टि से जीता है। संन्यासी की दृष्टि ऐसी परिपक्व हो गयी थी कि गधे में चैतन्य आत्मा देखा तो वास्तव में उसके शरीर में चैतन्य आत्मा आ गया और वह जिन्दा हो गया। तुम अपनी दृष्टि को ऐसी ज्ञानमयी होने दो तो फिर सारा जगत तुम्हारे लिए आत्ममय हो जायेगा।


BAPUJI K SATSANG PARVACHAN SE.......

देखा इतने महान है हमारे बापू....

वाह बापू वाह....

कितने महान हो आप कभी भी अपनी तारीफ नहीं करते ...

हमेशा हमारा ही भला सोचते हो.....

धन्य हुए हम जो आपको पाया....

जय हो....

KAMAL HIRANI

रविवार, 9 मई 2010

श्री आशारामायण पाठ (इंग्लिश)

Guru charan raj sheesh dhari, Hriday roop vichaari
Shri Asaramayan kaho vedanta ko saar
Dharm kaamaarath moksha de rog shok sanhaar
Bhaje jo bhakti bhaav se shigraha ho beda paar

Bhaarat sindhu nadi bakhaani Nawaab jile mein gaav berani
Rehata ek seth gunkhaani naam Thaumal Sirumalani
Aagya mein rehati Mehgiba pati parayan naam Mangiba
Chait vad chhaha unnees athaanve Aasumal avtarit aangne
Maa man mein umada sukh sagar dwaar pe aaya ek saudagar
Laaya ek ati sundar jhoola dekh pita man harsh se phula
Sabhie chakit ishwar ki maya uchit samay par kaise aaya
Ishwar ki yeh leela bhari baalak hai koi chamatkaari

Sant seva aur shruti shravan maat peetaa upkaari
Dharma purush janma koi punyo ka phal bhari

Surat thi baalak ki saloni, aate hi kar di anhoni
Samaaj mein hti maanyata jaisi, prachalit ek kahavat aisi
Teen behan ke baad jo aata putra woh trekhan kehalata
Hota ashubh amangal kaari daridrata laata hai bhari
Viparit kintu diya dikhaai ghar mein jaise Lakshmi aayi
Tirloki ka aasan dola Kuber ne bhandaar hi khola
Maan pratishtha aur badhai sab ke man sukh shanti chaai

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Tejomay baalak badha aanand badhaa apaar
Sheel shanti ka atmadhan karne lagaa vistaar

Ek dinaa Thaumal dwaare Kulguru Parshuraam padhaare
Jyun hi ve baalak ko nihaare anaayaas hi sahasa pukaare
Yah nahin baalak saadharan hai, daivee lakshan tej hai kaaran
Netron mein hai saatvik lakshan iske kaarya bade vilakshan
Yah to Mahaan Sant banega logon ka udhaar karega
Suni Guru ki bhavishya vaani gad gad ho gaye Sirumalani
Maata ne bhi maatha chooma har koi lekarke ghooma

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Gyaani vairaagi poorva ka tere ghar mein aaye
JanmA liya hai yogi ne putra tera kehalaye
Paawan tera kul hua janani kokha kritaarth
Naam amar tera hua, purna chaar purushaarth

Saitaalis mein desh vibhajan, pak mein choda bhu pashu au dhan
Bharat Amdavad mein aaye Maninagar mein shiksha paaye
Badi vilakshan smaran shakti Asumal ki ashu yukti
Tivra buddhi ekagra namrata tvarit kaarya aur sahansheelta
Asumal prasanna mukh rehate shikshak Hasmukhbhai kehate
Pista badam kaaju akhrota bhare jeb khaate bhar peta
De de makkhan mishri kuja maa ne sikhaya dhyan aur pooja
Dhyaan ka swaad lagaa tab aise, rahey na machhali jal bin jaise
Hue Bramhavidya se yukta ve vahi ahi vidya ya vimuktaye
Bahut raat tak pair dabaate bhare kanth pitu aashish paate

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Putra tumahara jagat mein sada rahega naam
Logon ke tumse sada puran honge kaam

Seer se hati pita ki chaaya tab maaya ne jaal phailaya
Badey bhai ka hua dushashan vyarth hue maa ke aashwashan
Chhoota vaibhav schooli shiksha shooro ho gai agni pariksha
Gaye Siddhpur naukari karne Krishna ke aage bahaaye jharne
Sevak sakha bhaav se bheeje, Govind Madhav tab reejhe
Ek dina ek maai aayi boli he bhagwan sukhdaayi
Pade putra dukh mujhe jhelne khoon case do bete jail mein
Bole Aasu sukh paavenge nirdosh chut jaldi aavenge
Bete ghar aaye maa bhaagi Aasumal ke paavon lagi

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Aasumal ka pushta hua aalokik prabhaav
Vaak siddhi ki shakti ka ho gaya pradurbhaav

Baras Siddhpur teen bitaaye laut amdavad mein aaye
Karne lagi Lakshmi nartan kiya bahi ka dil parivartan
Daridrata ko door kar diya ghar vaibhav bharpur kar diya
Cinema unhe kabhi na bhaaye balat le gaye rote aaye
Jis maa ne tha dhyaan sikhaya usko hi ab rona aaya
Maa karana chahti thi shaadi Aasumal ka man bairaagi
Phir bhi sabne shakti laagayi jabran kar di unki sagaai
Shaadi ko jab hua unka man Aasumal kar gaye palaayan

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Pandit kaha Guru Samarth ko Ramdas savdhan
Shaadi phere phirte hue bhaaage chhuda kar jaan

Karat khoj mein nikal gaya dum mile bharuch mein ashok ashram
Kathinaai se mila raasta pratishtha ka diya vaasta
Ghar mein laaye aajmaaye Guru baarat le pahunche aadipur
Vivaah hua par man dridhaaya bhagat ne patni ko samajhaaya
Apna vyauhar hoga aise jal mein kamal rehata hai jaise
Saansaarik vyavahaar tab hogaa, jab mujhe Saakshaatkaar hoga
Saath rahe jyun aatma kaaya saath rahe vairaagi maya

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Anashwar hoon main jaanta sat-chit hoo anand
Sthiti mein jeene lagoon hove parmananda

Mool granth adhyayan ke hetu Sanskrit bhasha hai ek setu
Sanskrit ki shiksha paayi gati aur sadhana badhaai
Ek shlok hriday mein paitha vairagya soya uth baitha
Asha chhod nairashya avalambit uski shiksha purna anushthit
Lakshmi devi ko samjhaya isha praapti ka dhyeya bataaya
Chhod ke ghar main ab jaoonga lakshya prapta kar laut aaoonga
Kedarnath ke darshan paaye lakshadhipati ashish paye
Puni pooja punah sankalpaaye isha prapti ashish paye
Aaye Krishna leela sthali mein Vrindavan ki kunj galin mein
Krishna ne man mein aisa dhaala ve ja pahunche Nainitala
Wahan thhey Shrotriya Bramhanishthit Swami Leelashah Pratishtit
Bhitar taral thee bahar kathora nirvikalpa jyun kagaz kora
Purna swatantra param upkari brahmanishtha atma saakhshaatkaari

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Isha-krupa bina Guru nahin Guru bina nahin Gyaan
Gyaan bina atma nahin gavahi Ved-Puraan

Jaanne ko saadhak ki koti sattar din tak hui kasoti
Kanchan ko agni mein tapaaya, Guru ne Aasumal bulwaya
Kaha grihasth ho karma hi karna dhyan bhajan ghar par hi karna
Aagya maani ghar par aaye, paksha mein Moti-Coral dhaaye
Narmada tat par dhyan lagaaye, Lalji Maharaj aakarshaaye
Saprem shila swami paha dhaye Datta-kuteer mein sagrah laaye
Umada prabhu prem ka chaskaa anusthaan chaalis diwas ka
Mare chhaha shatru sthiti paayi bramha nishthata sahaja samai
Shubha-Ashubha sam ronaa-ganaa grishma thand maan aur apmana
Tripta ho khaana bhook aru pyaas mahal aur kutiyaa aas niraas
Bhakti yoga gyaan abhyaasi hue samaan Magahar aur Kaasi

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Bhaav hi kaaran ish hai na swarna kaashth paashan
Sata-Chita-Ananda roop hai vyaapak hai Bhagawaan
Bramheshaan Janaardan Saarad Shesh Ganesh
Niraakaar saakaar hai, hai sarvatra bhavesh

Hue Aasumal bramha-abhyaasi, janm aneko laage baasi
Dur ho gayi aadhi vyaadhi siddha ho gayi sahaj samaadhi
Ik raat nadi tat man aakarsha aai jor se aandhi varsha
Band makaan baramda khali baithe wahin samadhi lagaali
Dekha kisine socha daku laaye laathi bhaala chaku
Daude chikhe shor mach gayaa, tuti samaadhi dhyaan khinch gayaa
Sadhak utha, thhey bikhare keshaa raag dvesh naa kinchit leshaa
Saral logon ne saadhu manaa, hathyaaron ne kaal hi jaana
Bhairav dekh dusht ghabaraaye, pahalwaan jyun malla hi paaye
Kaami janon ne aashiq maana, sadhujan kinhe parnaama

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Ek drishti dekhe sabhie chaley shaant gambhir
Sashastron ki bheed ko sahaj gaye ve cheer

Maata aayi dharam ki sevi saath mein patni Lakshmi devi
Dono phut phut ke roi, rudan dekh karunaa bhi roi
Sant Lalji hridaya pasija, har darshak aansoo mein bhija
Kaha sabhie ne aap jaaiyo, Asumal bole ki bhaiyon
Chaalis diwas hua nahi pura, anusthaan hai mera adhura
Asumal ne chodi titiksha, maa patni ne ki partiksha
Jis din gaon se hui vidaai jaar jaar roe log lugai
Amdavad ko hue ravana, miyaa-gaon se kiya payana
Mumbai gaye Guru ki chaah, mile vahin pe Lilashah
Param pita ne putra ko dekha, surya ne ghat jal mein pekha
Ghatak tod jal jal mein milaya, jal prakash aakash mein chhaya
Nij swaroop ka gyaan dridhaya, dhai diwas tak hosh na aaya

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Aasoj sud do diwas , sanwat bees ikkis
Madhyaanh dhaai baje mila Eesh se Eesh
Deh sabhie mithya hui jagat hua nissar
Hua aatma se tabhi apna sakhshatkar

Param swatantra purush darshaya, jeev gaya aur shiv ko paaya
Jaan liya hoon shant niranjan, laagu mujhe na koi bandhan
Yah jagat sara hai nashwar, main hi shaashwat ek anashwar
Deed hai do par drishti ek hai, laghu guru mein wahi ek hai
Sarvatra ek kise batlaaye, sarv vyaapt kahaan aaye jaaye
Anant shaktiwala avinaashi, riddhi siddhi uski daasi
Saaraa hi bramhand pasaaraa, chale uski ichchaa anusaaraa
Yadi wah sankalp chalaaye, murda bhi jeevit ho jaaye

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Brahmi stithi prapt kar kaarya rahe na shesh
Moh kabhie na thag sake ichchaa nahin lavlesh
Purna guru kirpa mili purna guru ka gyaan
Asumal se ho gaye Sai Asaram

Jaagrat swapna sushupti chete, brahmanand ka anand letey
Khaate peete maun ya kahate, brahmanand masti mein rahate
Raho grihastha guru ka aadesh, grihast sadhu karo updesh
Kiye guru ne vaare nyaare, gujarat Disaa gaon padhare
Mrut gaay diya jeevan daanaa, tab se logon ne pehachana
Dwaar pe kehate Narayan Hari, lene jaate kabhie madhukari
Tab se ve satsang sunaate, sabhie aarti shanti paate
Jo aaya uddhar kar diya, bhakt ka beda paar kar diya
Kitne marnasann jilaaye, vyasan maans aur maddya chhudaaye

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Ek din man uktaa gayaa kiyaa Disaa se kooch
Aayi mauj fakir ki diyaa jhopadaa phuk

Ve Naareshwar dhaam padhare, ja pahunche Narmada kinare
Meelon peeche chhoda mandir, gaye ghor jungle ke andar
Ghane vriksha tale patthar par, baithe dhayaan Niranjan ka dhar
Raat gayi prabhaat ho aayi baal Ravi ne surat dikhaai
Praatah pakshi kooyal kuakanta, chhuta dhyaan uthe tab santaa
Praatarvidhi nivrit ho aaye, tab aabhas kshudhaa ka paaye
Socha main na kahin jaoonga, yahin baith kar ab khaoonga
Jisko garaj hogi aayega srishti karta khud laayega
Jyun hi man vichaar ve laaye tyun hi do kisan wahan aaye
Dono sir par baandhe saafa, khaadya peya liye dono haatha
Bole jeevan safal hai aaj arghya swikaro Maharaj
Bole Sant aur pe jao jo hai tumhara use khilao
Bole kisan apko dekha, swapna mein maarag raat ko pekha
Hamara na koi Sant hai duja, aao gaon karein tumhari pooja
Asaram tab man mein dhaare, niraakaar aadhaar hamare
Piya dudh thoda phal khaya, nadi kinare jogi dhaaya

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Gandhinagar gujarat mein hai Motera gram
Bramhanishta Shri Sant ka yahin hai paavan dhaam
Atmanand mein mast hai kare vedanti khel
Bhakti yog aur gyaan ka Sadguru karte mel
Saadhikaaon ka alag ashram naari uthhan
Naari shakti jagrit sada jiska nahin bayaan

Baalak vriddha aur nar naari sabhie prerna paaye bhari
Ek baar jo darshan paaye, shanti ka anubhav ho jaaye
Nitya vividh prayog karaye, naad-anusandhan bataye
Naabhi se ve Om kehalayen, hriday se ve Ram kehalayen
Samanya dhyaan jo lagaye unhein ve gehare mein le jaye
Sabko nirbhay yog sikhayen, sabka atmotthan karayen
Hajjaro ke rog mitaaye, aur laakhon ke shok chhudaaye
Amritmay prasad jab dete, bhakt ka rog shok har lete
Jisne naam ka daan liya hai, Guru amrit ka paan kiya hai
Unka yog kshem ve rakhte, ve na teen taapon se tapte
Dharm kamarath moksha ve paate aapad rogon se bach jaate
Sabhie shishya raksha pate hain sukshma shareer Guru aate hain
Sachmuch Guru hai deen dayal, sahaj hi kar dete hai nihaal
Ve chaahate sab jholi bhar le nij atma ka darshan kar lein
Ek sau aanth jo paath karenge, unke sare kaaj sarenge
Gangaram sheel hai dasa, hongi purna sabhie abhilasha

Hari om Hari om Hari om Hari Om – Hari om Hari om Hari om Hari Om
Varabhayadata Sadguru param hi bhakta krupal
Nischal prem se jo bhaje Sai kare nihaal
Man mein naam tera rahe, mukh pe rahe sugeet
Humko itna dijiye, rahe charan mein preet

श्री आसारामायण पाठ

श्री आसारामायण

गुरु चरण रज शीष धरि, हृदय रूप विचार।
श्रीआसारामायण कहौं, वेदान्त को सार।।
धर्म कामार्थ मोक्ष दे, रोग शोक संहार।
भजे जो भक्ति भाव से, शीघ्र हो बेड़ा पार।।

भारत सिंधु नदी बखानी, नवाब जिले में गाँव बेराणी।
रहता एक सेठ गुण खानि, नाम थाऊमल सिरुमलानी।।
आज्ञा में रहती मेंहगीबा, पतिपरायण नाम मंगीबा।
चैत वद छः उन्नीस अठानवे, आसुमल अवतरित आँगने।।
माँ मन में उमड़ा सुख सागर, द्वार पै आया एक सौदागर।
लाया एक अति सुन्दर झूला, देख पिता मन हर्ष से फूला।।
सभी चकित ईश्वर की माया, उचित समय पर कैसे आया।

ईश्वर की ये लीला भारी, बालक है कोई चमत्कारी।।
संत की सेवा औ’ श्रुति श्रवण, मात पिता उपकारी।

धर्म पुरुष जन्मा कोई, पुण्यों का फल भारी।।
सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी।
समाज में थी मान्यता जैसी, प्रचलित एक कहावत ऐसी।।
तीन बहन के बाद जो आता, पुत्र वह त्रेखन कहलाता।
होता अशुभ अमंगलकारी, दरिदता लाता है भारी।।
विपरीत किंतु दिया दिखाई, घर में जैसे लक्ष्मी आयी।
तिरलोकी का आसन डोला, कुबेर ने भंडार ही खोला।
मान प्रतिष्ठा और बड़ाई, सबके मन सुख शांति छाई।।

तेजोमय बालक बढ़ा, आनन्द बढ़ा अपार।
शील शांति का आत्मधन, करने लगा विस्तार।।

एक दिना थाऊमल द्वारे, कुलगुरु परशुराम पधारे।
ज्यूँ ही बालक को निहारे, अनायास ही सहसा पुकारे।।
यह नहीं बालक साधारण, दैवी लक्षण तेज है कारण।
नेत्रों में है सात्विक लक्षण, इसके कार्य बड़े विलक्षण।।
यह तो महान संत बनेगा, लोगों का उद्धार करेगा।
सुनी गुरु की भविष्यवाणी, गदगद हो गये सिरुमलानी।
माता ने भी माथा चूमा, हर कोई ले करके घूमा।।

ज्ञानी वैरागी पूर्व का, तेरे घर में आय।
जन्म लिया है योगी ने, पुत्र तेरा कहलाय।।
पावन तेरा कुल हुआ, जननी कोख कृतार्थ।
नाम अमर तेरा हुआ, पूर्ण चार पुरुषार्थ।।

सैतालीस में देश विभाजन, पाक में छोड़ा भू पशु औ’ धन।
भारत अमदावाद में आये, मणिनगर में शिक्षा पाये।।
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति, आसुमल की आशु युक्ति।
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता, त्वरित कार्य औ’ सहनशीलता।।
आसुमल प्रसन्न मुख रहते, शिक्षक हँसमुखभाई कहते।
पिस्ता बादाम काजू अखरोटा, भरे जेब खाते भर पेटा।।
दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ’ पूजा।
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे, रहे न मछली जल बिन जैसे।।
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे, वही है विद्या या विमुक्तये।
बहुत रात तक पैर दबाते, भरे कंठ पितु आशीष पाते।।

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम।
लोगों के तुम से सदा, पूरण होंगे काम।।

सिर से हटी पिता की छाया, तब माया ने जाल फैलाया।
बड़े भाई का हुआ दुःशासन, व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन।।
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा, शुरु हो गयी अग्नि परीक्षा।
गये सिद्धपुर नौकरी करने, कृष्ण के आगे बहाये झरने।।
सेवक सखा भाव से भीजे, गोविन्द माधव तब रीझे।
एक दिन एक माई आई, बोली हे भगवन सुखदाई।।
पड़े पुत्र दुःख मुझे झेलने, खून केस दो बेटे जेल में।
बोले आसु सुख पावेंगे, निर्दोष छूट जल्दी आवेंगे।
बेटे घर आये माँ भागी, आसुमल के पाँवों लागी।।

आसुमल का पुष्ट हुआ, अलौकिक प्रभाव।
वाकसिद्धि की शक्ति का, हो गया प्रादुर्भाव।।

बरस सिद्धपुर तीन बिताये, लौट अमदावाद में आये।
करने लगी लक्ष्मी नर्तन, किया भाई का दिल परिवर्तन।।
दरिद्रता को दूर कर दिया, घर वैभव भरपूर कर दिया।
सिनेमा उन्हें कभी न भाये, बलात् ले गये रोते आये।।
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया, उसको ही अब रोना आया।
माँ कराना चाहती थी शादी, आसुमल का मन वैरागी।।
फिर भी सबने शक्ति लगाई, जबरन कर दी उनकी सगाई।
शादी को जब हुआ उनका मन, आसुमल कर गये पलायन।।

पंडित कहा गुरु समर्थ को, रामदास सावधान।
शादी फेरे फिरते हुए, भागे छुड़ाकर जान।।

करत खोज में निकल गया दम, मिले भरूच में अशोक आश्रम।
कठिनाई से मिला रास्ता, प्रतिष्ठा का दिया वास्ता।।
घर में लाये आजमाये गुर, बारात ले पहुँचे आदिपुर।
विवाह हुआ पर मन दृढ़ाया, भगत ने पत्नी को समझाया।।
अपना व्यवहार होगा ऐसे, जल में कमल रहता है जैसे।
सांसारिक व्यौहार तब होगा, जब मुझे साक्षात्कार होगा।
साथ रहे ज्यूँ आत्माकाया, साथ रहे वैरागी माया।।

अनश्वर हूँ मैं जानता, सत चित हूँ आनन्द।
स्थिति में जीने लगूँ, होवे परमानन्द।।

मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु, संस्कृत भाषा है एक सेतु।
संस्कृत की शिक्षा पाई, गति और साधना बढ़ाई।।
एक श्लोक हृदय में पैठा, वैराग्य सोया उठ बैठा।
आशा छोड़ नैराश्यवलंबित, उसकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित।।
लक्ष्मी देवी को समझाया, ईश प्राप्ति ध्येय बताया।
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा, लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा।।
केदारनाथ के दर्शन पाये, लक्षाधिपति आशिष पाये।
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये, ईश प्राप्ति आशिष पाये।।
आये कृष्ण लीलास्थली में, वृन्दावन की कुंज गलिन में।
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला, वे जा पहुँचे नैनिताला।।
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित, स्वामी लीलाशाह प्रतिष्ठित।
भीतर तरल थे बाहर कठोरा, निर्विकल्प ज्यूँ कागज कोरा।
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी, ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी।।

ईशकृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान।।

जानने को साधक की कोटि, सत्तर दिन तक हुई कसौटी।
कंचन को अग्नि में तपाया, गुरु ने आसुमल बुलवाया।।
कहा गृहस्थ हो कर्म करना, ध्यान भजन घर ही करना।
आज्ञा मानी घर पर आये, पक्ष में मोटी कोरल धाये।।
नर्मदा तट पर ध्यान लगाये, लालजी महाराज आकर्षाये।
सप्रेम शीलस्वामी पहँ धाये, दत्तकुटीर में साग्रह लाये।।
उमड़ा प्रभु प्रेम का चसका, अनुष्ठान चालीस दिवस का।
मरे छः शत्रु स्थिति पाई, ब्रह्मनिष्ठता सहज समाई।।
शुभाशुभ सम रोना गाना, ग्रीष्म ठंड मान औ’ अपमाना।
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास, महल औ’ कुटिया आसनिरास।
भक्तियोग ज्ञान अभ्यासी, हुए समान मगहर औ’ कासी।।

भव ही कारण ईश है, न स्वर्ण काठ पाषान।
सत चित्त आनंदस्वरूप है, व्यापक है भगवान।।
ब्रह्मेशान जनार्दन, सारद सेस गणेश।
निराकार साकार है, है सर्वत्र भवेश।।

हुए आसुमल ब्रह्माभ्यासी, जन्म अनेकों लागे बासी।
दूर हो गई आधि व्याधि, सिद्ध हो गई सहज समाधि।।
इक रात नदी तट मन आकर्षा, आई जोर से आँधी वर्षा।
बंद मकान बरामदा खाली, बैठे वहीं समाधि लगा ली।।
देखा किसी ने सोचा डाकू, लाये लाठी भाला चाकू।
दौड़े चीखे शोर मच गया, टूटी समाधि ध्यान खिंच गया।।
साधक उठा थे बिखरे केशा, राग द्वेष ना किंचित् लेशा।
सरल लोगों ने साधु माना, हत्यारों ने काल ही जाना।।
भैरव देख दुष्ट घबराये, पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाये।
कामीजनों ने आशिक माना, साधुजन कीन्हें परनामा।।

एक दृष्टि देखे सभी, चले शांत गम्भीर।
सशस्त्रों की भीड़ को, सहज गये वे चीर।।

माता आई धर्म की सेवी, साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी।
दोनों फूट-फूट के रोई, रुदन देख करुणा भी रोई।।
संत लालजी हृदय पसीजा, हर दर्शक आँसू में भीजा।
कहा सभी ने आप जाइयो, आसुमल बोले कि भाइयों।।
चालीस दिवस हुआ न पूरा, अनुष्ठान है मेरा अधूरा।
आसुमल ने छोड़ी तितिक्षा, माँ पत्नी ने की परतीक्षा।।
जिस दिन गाँव से हुई विदाई, जार जार रोय लोग-लुगाई।
अमदावाद को हुए रवाना, मियाँगाँव से किया पयाना।।
मुंबई गये गुरु की चाह, मिले वहीं पै लीलाशाह।
परम पिता ने पुत्र को देखा, सूर्य ने घटजल में पेखा।।

घटक तोड़ जल जल में मिलाया, जल प्रकाश आकाश में छाया।
निज स्वरूप का ज्ञान दृढ़ाया, ढाई दिवस होश न आया।।

आसोज सुद दो दिवस, संवत् बीस इक्कीस।
मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।
देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।
हुआ आत्मा से तभी, अपना साक्षात्कार।।

परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया, जीव गया और शिव को पाया।
जान लिया हूँ शांत निरंजन, लागू मुझे न कोई बन्धन।।
यह जगत सारा है नश्वर, मैं ही शाश्वत एक अनश्वर।
दीद हैं दो पर दृष्टि एक है, लघु गुरु में वही एक है।।
सर्वत्र एक किसे बतलाये, सर्वव्याप्त कहाँ आये जाये।
अनन्त शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी।।
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा, चले उसकी इच्छानुसारा।
यदि वह संकल्प चलाये, मुर्दा भी जीवित हो जाये।।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष।
मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।
पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।
आसुमल से हो गये, साँई आसाराम।।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते, ब्रह्मानन्द का आनन्द लेते।
खाते पीते मौन या कहते, ब्रह्मानन्द मस्ती में रहते।।
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश, गृहस्थ साधु करो उपदेश।
किये गुरु ने वारे न्यारे, गुजरात डीसा गाँव पधारे।
मृत गाय दिया जीवन दाना, तब से लोगों ने पहचाना।।
द्वार पै कहते नारायण हरि, लेने जाते कभी मधुकरी।
तब से वे सत्संग सुनाते, सभी आर्ती शांति पाते।।
जो आया उद्धार कर दिया, भक्त का बेड़ा पार कर दिया।
कितने मरणासन्न जिलाये, व्यसन मांस और मद्य छुड़ाये।।

एक दिन मन उकता गया, किया डीसा से कूच।
आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक।।

वे नारेश्वर धाम पधारे, जा पहुँचे नर्मदा किनारे।
मीलों पीछे छोड़ा मन्दर, गये घोर जंगल के अन्दर।।
घने वृक्ष तले पत्थर पर, बैठे ध्यान निरंजन का घर।
रात गयी प्रभात हो आई, बाल रवि ने सूरत दिखाई।।
प्रातः पक्षी कोयल कूकन्ता, छूटा ध्यान उठे तब संता।
प्रातर्विधि निवृत्त हो आये, तब आभास क्षुधा का पाये।।
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर अब खाऊँगा।
जिसको गरज होगी आयेगा, सृष्टिकर्त्ता खुद लायेगा।।
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये, त्यूँ ही दो किसान वहाँ आये।
दोनों सिर बाँधे साफा, खाद्यपेय लिये दोनों हाथा।।
बोले जीवन सफल है आज, अर्घ्य स्वीकारो महाराज।
बोले संत और पै जाओ, जो है तुम्हारा उसे खिलाओ।।
बोले किसान आपको देखा, स्वप्न में मार्ग रात को देखा।
हमारा न कोई संत है दूजा, आओ गाँव करें तुमरी पूजा।।

आसाराम तब में धारे, निराकार आधार हमारे।

पिया दूध थोड़ा फल खाया, नदी किनारे जोगी धाया।।
गाँधीनगर गुजरात में, है मोटेरा ग्राम।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का, यहीं है पावन धाम।।
आत्मानंद में मस्त हैं, करें वेदान्ती खेल।
भक्तियोग और ज्ञान का, सदगुरु करते मेल।।
साधिकाओं का अलग, आश्रम नारी उत्थान।
नारी शक्ति जागृत सदा, जिसका नहीं बयान।।
बालक वृद्ध और नरनारी, सभी प्रेरणा पायें भारी।
एक बार जो दर्शन पाये, शांति का अनुभव हो जाये।।
नित्य विविध प्रयोग करायें, नादानुसन्धान बतायें।
नाभ से वे ओम कहलायें, हृदय से वे राम कहलायें।।
सामान्य ध्यान जो लगायें, उन्हें वे गहरे में ले जायें।
सबको निर्भय योग सिखायें, सबका आत्मोत्थान करायें।।
हजारों के रोग मिटाये, और लाखों के शोक छुड़ाये।
अमृतमय प्रसाद जब देते, भक्त का रोग शोक हर लेते।।
जिसने नाम का दान लिया है, गुरु अमृत का पान किया है।
उनका योग क्षेम वे रखते, वे न तीन तापों से तपते।।
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते, आपद रोगों से बच जाते।
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं, सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं।।
सचमुच गुरु हैं दीनदयाल, सहज ही कर देते हैं निहाल।
वे चाहते सब झोली भर लें, निज आत्मा का दर्शन कर लें।।
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे।
गंगाराम शील है दासा, होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा।।

वराभयदाता सदगुरु, परम हि भक्त कृपाल।
निश्छल प्रेम से जो भजे, साँई करे निहाल।।
मन में नाम तेरा रहे, मुख पे रहे सुगीत।
हमको इतना दीजिए, रहे चरण में प्रीत।।

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श्री गुरु-महिमा

गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न भेद।
गुरु बिन संशय न मिटे, जय जय जय गुरुदेव।।
तीरथ का है एक फल, संत मिले फल चार।
सदगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार।।
भव भ्रमण संसार दुःख, ता का वार ना पार।
निर्लोभी सदगुरु बिना, कौन उतारे पार।।
पूरा सदगुरु सेवतां, अंतर प्रगटे आप।
मनसा वाचा कर्मणा, मिटें जन्म के ताप।।
समदृष्टि सदगुरु किया, मेटा भरम विकार।
जहँ देखो तहँ एक ही, साहिब का दीदार।।
आत्मभ्रांति सम रोग नहीं, सदगुरु वैद्य सुजान।
गुरु आज्ञा सम पथ्य नहीं, औषध विचार ध्यान।।
सदगुरु पद में समात हैं, अरिहंतादि पद सब।
तातैं सदगुरु चरण को, उपासौ तजि गर्व।।
बिना नयन पावे नहीं, बिना नयन की बात।
सेवे सदगुरु के चरण, सो पावे साक्षात्।।

Vishnu Sahasra Nama Stotram-English

Shuklam Baradaram Vishnum, Sasi Varnam Chatur Bhujam,

Prasanna Vadanan Dyayet, Sarva Vignoba Sandaye

Vyasam Vasishtanaptharam, Sakthe Poutramakalmasham,

Parasarathmajam vande, Shukathatham Taponidhim.

Vyasa Vishnu Roopaya, Vyasa Roopaya Vishnave,

Nmo Vai Brahma Vidaya, Vasishtaya Namo Nama.

Avikaraya Shuddhaya, Nityaya Paramatmane,

Sadaika Roopa Roopaya, Vishnave Sarva Jishnave.

Yasya smarana Mathrena, Janma Samsara bandhanath.

Vimuchayate Nama Tasmai , Vishnave Prabha Vishnave

OM Namo Vishnave Prabha Vishnave ,

Shri Vaisampayana Uvacha:-

Shrutva dharmaneshena , Pavanani cha Sarvasha,

Yudishtra santhanavam Puneravabhya Bhashata,

Yudishtra Uvacha:-

Kimekam Daivatham Loke, Kim Vapyegam Parayanam,

Sthuvantha Kam Kamarchanda Prapnyur Manava Shubham,

Ko Dharma sarva Dharmanam Paramo Matha,

Kim Japan Muchyathe Jandur Janma Samsara Bhandanat ,

Bheeshma Uvacha:-

Jagat Prabhum devadevam Anantham Purushottamam,

Stuvan nama Sahasrena, Purusha Sathathothida,

Tameva charchayan nityam, Bhaktya purushamavyayam,

Dhyayan sthuvan namasyancha yajamanasthameva cha,

Anadi nidhanam vishnum sarva loka Maheswaram

Lokadyaksham stuvannityam Sarva dukkhago bhaved,

Brahmanyam sarva dharmagnam Lokanam keerthi vardhanam,

Lokanatham Mahadbhootham Sarva Bhootha bhavodbhavam

Aeshame sarva dharmanam dharmadhika tamo matha,

Yad bhaktyo pundarikaksham Stuvyr-archanayr- nara sada,

Paramam yo mahatteja, paramam yo mahattapa

Paramam yo mahad brahma paramam ya parayanam

Pavithranam Pavithram yo mangalanam cha mangalam,

Dhaivatham devathanam cha bhootanam yo vya pitha

Yatha sarvani bhoothani bhavandyathi yugagame

Yasmincha pralayam yanthi punareve yuga kshaye

Tasya Loka pradhanasya Jagannatathasya bhoopathe

Vishno nama sahasram me Srunu papa bhayapaham

Rishir Namnam Sahsrasya Veda Vyaso Maha Muni

Chando aunustup stada devo bhagawan devaki sutha

Amruthamsu Bhavo Bhhejam Shakthir devaki nandana

Trisama hridayam tasya santhyarthe viniyujyade

Vishnum Jishnum Mahavishnum Prabha vishnun Maheswaram

Aneka Roopa Daityantham Namami purushottamam.

DHYANAM

Ksheerodanvath pradese suchimani vilasad saikathe Maukthikanam

Malaklupthasanastha Spatikamani nibhai maukthiker mandithanga

Shubrai-rabrai- rathabrai ruparivirachitai muktha peeyusha varshai

Anandi na puniyadari nalina Gadha sankapanir Mukunda

Bhoo padau yasya nabhi r viyadasu ranila schandra suryaau cha nether

Karnavasasiro dhaumugamabhi dhahano yasya vasteyamabhdhi

Anthastham yasya viswam sura nara khaga go bhogi gandharva dhaityai,

Chitram ram ramyathe tham thribhuvana vapusham vishnumeesam namami

Santhakaram Bujaga sayanam Padmanabham suresam,

Viswadharam Gagana sadrusam Megha varnam shubangam


Lakshmi kantham kamala nayanam Yogi hrid dyana gamyam

Vande vishnum bava bhayaharam sava lokaika nadham

Megha syamam Peetha kouseys vasam Srivatsangam Kausthuboth bhasithangam

Punyopetham pundareekayathaksha m Vishnum vande sarva lokaika natham

Sasanga chakram sakerita kundalam sappeethavastram saraseruhekshanam,

Sahara vaksha sthala shobhi kousthubham namai Vishnum sirasa chaturbhujam

Chayayam Parijatasys hemasimhasanopari,

Aseenamam budha syama Mayathakashamalangr utham,

Chandranana chathurbahum sreevatsangitha vakshasam,

Rukmani Satyabhamabhyam Sahitham Krishnamasraye.

Sarvapraharanayuda OM Nama Idi

Vanamali Gadhi Sarnkhee Chakree cha nandaki

Sreeman narayano vishnur vasudevobhi rakshatu

Uttara Bhaga

Itidam Keerthanasya Kesavasya mahatmana,

Namnam sahasram Diwyanamaseshesna prakeerthitham

Ya tdam srunyuan nityam yaschapi parikeerthayed,

Nasubham prapunayad kinchid Soamuthre ha cha manava

Vedantago brahmana syad kshatriyo vijayi bhaved,

Vaisyo dhana samruddha syachyutha Sugapnuyad

Dharmarthi Prapnuyad Dharmam, Artharthi Cha Arthamapnuyad,

Kamanvapnuyad Kami, PrajarthiChapnuyad Prajam

Bhakthiman Ya sdaothaya , Suchistad gatha manasa,

Sahasram vasudevasya Namnamedat prakeerthayed

Yasa Prapnodhi vipulam yadi pradanya meva cha

Achalam sriyamapnodhi sryaprapnothyanutta mam

Na Bhayam kwachidapnodhi Veerya tejascha vindhati

Bhavatyarogo dyuthiman bala roopa gunanvidha

Rogartho muchayade rogat , Bhaddo muchyathe Bandanath,

Bhayan muchyathe Bheedasthu, muchyadepanna apada,

Durganyadarthyasu purusha purushottamam,

Stuvan nama sahasrena nityam bhakthi samanvida

Vasudevasryo marthyo vasudeva parayana,

Sarva papa vishudhatma Yati brahma sanathanam

Na vasudevabhaktanamas ubham vidyate Kwachit

Janma Nrutyu jara Vyadhi Bhayam naivopa jayade

Imam stavamaddeyana sraddha Bhakthi samanvidha,

Yujyedathma sukha kshanthi sri dhrithi smrithi keerthibhi

Na krodho na cha matsarya na shubha mati,

Bhavanthi kritha punyanam Bhakthanam puroshottame

Dhyau sachandrarka nakshatra Kham diso bhur mahadathi.

Vasudevasya veeryena vidhrithani mahatmana

Sasurasura gandharwa, sayakshoraga rahshasam,

Jagaddese vartatedam krishnasya sacharacharam

Indriyani mano bhuddhi satvam tejo bala dhruti.

Vasudevatmakanyahu kshetram ksheragna eve cha

Sarvagamanamachara pradamm parikalpathe,

Achara prabhavo dharma dharmasya prabhurachyutha

Hrishaya pitaro deva mahabhootani dhatava,

Jangamajangamam chedam jagannarayanodbhava m

Yogo gnanan thada sankhyam vidhya shilpadhi karma cha

Veda shastradi vignanam death sravam janardhanath.

Eko vishnu Mahadbhutham pradag Bhutanyanekasa,

Treem lokan vyapya bhutatma bhungte viswabhugavyaya

Imam stavam bhagavatho vishnur vyasena keerthitham,

Padedya icched purusha sreys prapthum sukhani cha

Visweswaramajam devam Jagatha Prabhumavyayam,

Bhajanthi Ye pushkaraksham na te yanthi parabhavam

Na te Yanthi Parabhava Om Na Ithi

Arjuna Uvacha:-

Padma Pathra Visalakha padmanabha surothama,

Bhakthanamanu rakthanam Tratho Bhava Janardhana

Sri Bhagawanuvacha: -

Yo mam nama sahasrena stothumichadi pandava,

Sohamekena slokena sthutha eva na samsaya

Sthutha eva na samsaya Om Nama Ithi

Vyasa Uvacha:-

Vasanad Vasudevasya vasitham bhuvana trayam,

Sarva bhutha nivasosi vasudeva namosthuthe.

Sri Vasudeva namosthuthe om nama ithi

Parvatyuvacha: -

Kenoupayena Laguna Vishnor nama sahasragam,

Patyadher Pandither nithyam Srothumichamyaham Prabho

Easwara Uvacha:-

Sri Rama Rama ramethi reme rame manorame,

Sahasra nama thathulyam rama nama varanane

Rama nama varanane om nama ithi

Brahmouvacha: -

Namostvanandaya sahasra moorthaye

Sahasra Padakshi sirory Bahave,

Sahasra namne purushaya saswathe ,

Sahasra koti yuga dharine nama

Sahasra Koti yuga dharine nama om nama ithi

Sanchaya Uvacha:-

Yatra Yogiswara Krishno Yatra Partho dhanurdhara

Tatra srirvijaya bhoothirdhruva neethir murthir mama

Sri Bhagawan Uvacha:-

Ananyaschinatayanto Mam ye jana parypasathe,

Thesham nityabhi yukthanam yogakshemam vahamyaham

Parithrayana sadhunam vinasaya cha dushkritham,

Dharma samsthapanarthaya sambhavami yuge yuge

Artha vishanna sidhilascha beetha, Goreshu cha vyadeeshu varthamana

Samkalpa narayana sabdha mathram vimuktha dukho sukhino bhavanthu

Kayenavacha Manasendryrva budhyatmanava prakrithai swabhawat,

Karomi yadyat sakalam parasmai narayanayethi samarpayami

OM TAT SAT

शनिवार, 8 मई 2010

परमा एकादशी 9-10.MAY 2010

अर्जुन बोले : हे जनार्दन ! आप अधिक (लौंद/मल/पुरुषोत्तम) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम

तथा उसके व्रत की विधि बतलाइये । इसमें किस देवता की पूजा की जाती है

तथा इसके व्रत से क्या फल मिलता है?



श्रीकृष्ण बोले : हे पार्थ ! इस एकादशी का नाम ‘परमा’ है ।

इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं

तथा मनुष्य को इस लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति मिलती है ।
भगवान विष्णु की धूप, दीप, नैवेध, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए ।
महर्षियों के साथ इस एकादशी की जो मनोहर कथा काम्पिल्य नगरी में हुई थी, कहता हूँ ।

ध्यानपूर्वक सुनो :



काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था । उसकी स्त्री अत्यन्त पवित्र तथा पतिव्रता थी । पूर्व के किसी पाप के कारण यह दम्पति अत्यन्त दरिद्र था ।
उस ब्राह्मण की पत्नी अपने पति की सेवा करती रहती थी
तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी ।



एक दिन सुमेधा अपनी पत्नी से बोला: ‘हे प्रिये !
गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती इसलिए मैं परदेश जाकर कुछ उद्योग करुँ ।’



उसकी पत्नी बोली: ‘हे प्राणनाथ ! पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे,
पत्नी को वही करना चाहिए । मनुष्य को पूर्वजन्म के कर्मों का फल मिलता है ।
विधाता ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह टाले से भी नहीं टलता । हे प्राणनाथ !
आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, जो भाग्य में होगा, वह यहीं मिल जायेगा ।’



पत्नी की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया ।
एक समय कौण्डिन्य मुनि उस जगह आये ।
उन्हें देखकर सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया
और बोले: ‘आज हम धन्य हुए ।
आपके दर्शन से हमारा जीवन सफल हुआ ।’
मुनि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया ।



भोजन के पश्चात् पतिव्रता बोली: ‘हे मुनिवर ! मेरे भाग्य से आप आ गये हैं ।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है ।
आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए उपाय बतायें ।’



इस पर कौण्डिन्य मुनि बोले :

‘अधिक मास’ (मल मास) की कृष्णपक्ष की ‘परमा एकादशी’ के व्रत से समस्त पाप,
दु:ख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं । जो मनुष्य इस व्रत को करता है,
वह धनवान हो जाता है । इस व्रत में कीर्तन भजन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए ।
महादेवजी ने कुबेर को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया है ।’



फिर मुनि कौण्डिन्य ने उन्हें ‘परमा एकादशी’ के व्रत की विधि कह सुनायी ।
मुनि बोले: ‘हे ब्राह्मणी ! इस दिन प्रात: काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर
विधिपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए ।
जो मनुष्य पाँच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं,
वे अपने माता पिता और स्त्रीसहित स्वर्गलोक को जाते हैं ।

हे ब्राह्मणी ! तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को करो ।

इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होगी |’



कौण्डिन्य मुनि के कहे अनुसार उन्होंने ‘परमा एकादशी’ का पाँच दिन तक व्रत किया ।
व्रत समाप्त होने पर ब्राह्मण की पत्नी ने एक राजकुमार को अपने यहाँ आते हुए देखा ।
राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से उन्हें आजीविका के लिए एक गाँव और एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था,
रहने के लिए दिया । दोनों इस व्रत के प्रभाव से इस लोक में अनन्त सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गये ।



हे पार्थ ! जो मनुष्य ‘परमा एकादशी’ का व्रत करता है,
उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिलता है ।
जिस प्रकार संसार में चार पैरवालों में गौ, देवताओं में इन्द्रराज श्रेष्ठ हैं,
उसी प्रकार मासों में अधिक मास उत्तम है ।
इस मास में पंचरात्रि अत्यन्त पुण्य देनेवाली है ।
इस महीने में ‘पद्मिनी एकादशी’ भी श्रेष्ठ है।

उसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्यमय लोकों की प्राप्ति होती है

एक ओर सच्चाई आशाराम बापू की.....

अपनी मनचाही में जो लगता है,


एक जन्म नहीं एक करोड़ जन्म ले ले और बड़े गुरु भी मिल जायें

तो भी मुक्ति नहीं मिलेगी।


मेरी हो सो जल जाय, तेरी हो सो रह जाय।

इससे हमको बड़ा फायदा हुआ।

बाल बढ़ जाते तो हम गुरुजी को चिट्ठी लिखते कि 'दाढ़ी-बाल बढ़ गये हैं,

मुँडन करूँ या छँटाई करूँ, जो आज्ञा....।'

गुरु जी कभी कहीं, कभी कहीं...

खत घूमता-फिरता जाता और फिर गुरुजी के इर्द-गिर्द

कृपानाथ लोग रहते थे कि 'आशारामजी का खत काहे को देना जल्दी से !'

तो कभी खत पहुँचे, कभी न पहुँचे, फिर भी कभी-कभी पहुँचके,

घूम फिर कर उतर आता कि छँटाई करा दो

तो हम छँटाई कराते, मुंडन कराते।

हमने मान रखा था कि हम समर्पित हैं

तो ये दाढ़ी-बाल हमारे बाप की चीज नहीं हैं, गुरुजी की चीज हैं।

गुरुजी की आज्ञा जब तक नहीं आती थी

तब तक हम छँटाई नहीं कराते थे।

बस, गुरुजी को कहेंगे वही....

तो मन के चंगुल से बचने में मुझे तो बहुत फायदा हुआ,

फटाक से फायदा हुआ।

आप लोग अपने मन की करवाने के लिए बापू के पास आते हैं
– यह कर दो, ऐसा कर दो, ऐसा ध्यान लग जाय....
' ईमानदारी से बोलो। मन की होती रही

तो 10000 जन्म बीत जायें पिया नहीं मिलेगा,

और सब मिल-मिल के मिट जायेंगे अपन कंगले रह जायेंगे !

अपने मन की हो तब भी वाह-वाह और नहीं हुई

तो दुगनी वाह-वाह कि तेरे मन की हुई वाह.... !

और यह भी बिल्कुल वैज्ञानिक बात है कि

सब अपने मन की होती नही, जितनी होती है वह सब भाती नहीं

और जो भाती हैं वह टिकती नहीं, इसमें संशय है क्या ?

तो फिर काहे को कंगले बनो, चलो कर दो आहुति...

जाने दो, जब टिकने वाली नहीं है तो अभी से भगवान के गले पड़ोः
'महाराज ! तेरी हो।' यह बहुत सुन्दर तरीका है बहुत ऊँची चीज पाने का !

सत्संग से जो भला होता है उसका वर्णन नहीं हो सकता।

सत्संग कर्ता का जितना उपकार मानो, उतना कम है।

जो सत्संग देने वाले संत का उपकार नहीं मानते

या उनमें दोषदर्शन करते हैं, उनको बड़ा भारी पाप लगता है।

उनकी बुद्धि मारी जाती है, कुंठित हो जाती है विकृत हो जाती है।

रब रूसे तो मत खसे। परमात्मा रूठता है तो मति मारी जाती है।

फिर कल्याणकर्ता में भी दोषदर्शन हो जायेगा।

BAPUJI K SATSANG PARVACHAN SE....

HARIOM .........

KAMAL.HIRANI
DUBAI

शुक्रवार, 7 मई 2010

मंत्र दीक्षा के लाभ.........

मंत्र दीक्षा से बहोत फायदे होते है..



1.चोरासी के फेरे से छूटते ..



2.आप की नाडियों पे गुरु मंत्र का प्रभाव पड़ता है…



कयादु के पेट मे प्रल्हाद को नारद जी से मंत्र मिला , सत्संग मिला तो ऐसा प्रभाव हुआ कि ,



बालक प्रल्हाद भक्त शिरोमणि हो गया…



3.गर्भस्त शिशु पे भी सत्संग का और गुरु मंत्र का बहोत अच्छा प्रभाव पड़ता है…



सत्संग का प्रभाव अपरम्पार है…



आत्मज्ञानी गुरु के मंत्र का जाप करे और गुरु ज्ञान का चिंतन करे तो क्या कहेना….!!

…जिन्होंने मंत्र दीक्षा ली है और नियम से साधना करते है



तो उनको सुख दुःख का प्रभाव पहले जैसा बहाता नही है..जरजरा बात मे इतनी अशांति नही होती…



ऐसे कई साधक है , जिनको बाईपास नही करनी पड़ी..



हाई लो बीपी की तकलीफ दूर हो गयी…पीलिया(जौंडीस) जैसे रोग ठीक हो जाते..



स्वास्थ्य ठीक रहता , आर्थिक समस्या मिटती ..



ऐसे अवांतर तो कई फायदे होते ही है…लेकिन पक्के ३३ प्रकार के फायदे तो होते ही है…





..शिव जी ने पार्वती को वामदेव गुरु से दीक्षा दिलाई



और माँ पार्वती को दीक्षा से बहोत फायदे महेसूस हुए ,



तो माँ पार्वती ने बहोत भारी स्तुति की है….



..कलकत्ता की काली माँ के रामकृष्ण परम हंस बहोत भक्त थे…



माँ को खिलाते तो पहले खुद चखते कि नमक आदि ठीक है कि नही.



.उनका सुंघा हुआ फूल माँ को चढाते…उनके सामने काली माँ साक्षात् प्रगट होती थी..…



लेकिन काली माँ ने रामकृष्ण को कहा कि “ ठाकुर , तोतापुरी गुरु से दीक्षा ले लो..”




रामकृष्ण बोले कि, “माँ , मुझे दीक्षा लेने की क्या जरुरत? मैं याद करता हूँ ,



तो आप साक्षात् प्रगट होती हो…!”


काली माँ ने कहा कि , “ तुम भाव के गहराई से याद करते तो मैं प्रगत होती हूँ..



लेकिन भाव बदलता तो अदृश भी हो जाती हूँ …..



भाव के गहराई मे जो तत्व है उसका ज्ञान तो तुम्हे गुरु कृपा से प्राप्त होगा…”



रामकृष्ण जी ने तोतापुरी गुरु जी से परम ज्ञान पाया….





..ऐसे ही महाराष्ट्र मे संत नामदेव को भी भगवान विठ्ठल ने प्रगट होकर बताया कि शिवबा खेचर से दीक्षा लो…



नामदेव ने शिवबा खेचर से दीक्षा ली और आत्म ज्ञान पाकर परम तत्व मे विश्रांति पाई..





..मुझे भी २२ साल की उमर मे लगता था कि मैंने बहोत कुछ पा लिया है..



लेकिन जब गुरु से मिला तो जाना कि अभी तक जो कुछ किया वो तो कुछ भी नही था…!



..गुरु कृपा से ही बहोत ऊँची स्थिति प्राप्त कर सकते है…



“गुरु कृपा ही केवलं , शिष्यस्य परम मंगलम !”



दीक्षा लेनी है तो २ शर्त माननी होती है कि , मुझे कुछ भी नही देना है ..



रुपिया, पैसा, फल, फूल कुछ भी नही ,



क्यो कि मुझे इसकी जरुरत नही और साल भर मे ४/५ बार ध्यान योग शिबिर लगते रहते है



तो एक शिबिर मे आना है ..शिबिर मे बौध्दिक जगत मे प्रवेश कराया जाता है…



विद्यार्थियोंको सारस्वत्य मंत्र दिया जाता है , जिससे उनकी बुध्दी चमक जाती है, ऐसे कई बच्चे तेजस्वी बने है….




..कल सुबह कुछ खाना पीना नही है , पानी पी सकते है..कल इतवार है ..



तुलसी के पत्ते इतवार को नही तोड़ते और अन्य दिन भी दोपहर के १२ बजे के बाद नही तोड़ना है..



कल तुलसी के पत्ते नही खाना है…


..दीक्षा से ही आधी साधना हो जाती है…



जब आत्मज्ञानी गुरु से चेतन मंत्र मिलता तो जैसे पॉवर होउस से कोंनेक्टर मिलता है..



कबीर जी को रामानंद स्वामी जैसे समर्थ गुरु मिले तो परम सिध्द तत्व मे जीते थे…



ध्रुव को नारद जी दीक्षा मिली थी…




..गुरु से जो मंत्र मिलता है वो किसी को बताया नही जाता…




..जाप करने कि भी ४ अवस्था होती है..



शुरू शुरू मे स्पष्ट रूप से बोला जाता है…



धीरे धीरे होठ बंद करके मंत्र का जाप होता है..



फिर कंठ मे जपना शुरू हो जाता है…



और मंत्र जाप से आनंद आने लगता है तो ह्रदय मे जप होने लगता है..




नारायण नारायण नारायण नारायण
ॐ शांति…
देखा इतने महान है मेरे बापूजी जिनको दीक्षा में भी कुछ नही चाइए ...

ऐसा कोई गुरु देखा जो फूल तक से इंकार करे....

जी हा वो दीक्षा देते है हमारी भलाई के लिए...

तो फिर देर किस बात की इस बात से हे समज जाओ की जिनको आप से एक फूल तक नही चाइए दक्षिणा में ...

तो वो कितने महान होंगे ....

आओ दोस्तों अपनी जिन्दगी सवारे ....

आओ चले बापूजी से दीक्षा लेने....और अपने जीवन को दे बदल ....

पता नही ऐसा मौका फिर मिले न मिले...

सदगुरूदेव की जय हो!!!!!

(गलातियोंके लिए प्रभुजी क्षमा करे…..)

गुरुवार, 6 मई 2010

मैं वारी जाऊँ ....

पिता थाऊमल के घर जन्मे -२ , तेरी जय हो मेह्गिबा के लाल
मैं वारी जाऊँ ....
मैं वारी जाऊँ बापू जी , बलिहारी जाऊँ बापू जी

मोटेरा तेरा धाम है -२ , तेरे भक्त आवे दरबार
मैं वारी जाऊँ ....

भक्तो के तुम कष्ट मिटते -२ , तेरी महिमा अपरम्पार
मैं वारी जाऊँ ....

भक्त जो नाम दान हैं लेते -२ , वो तर जावें भव पार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....

आप तो बापू ज्ञान बांटते -२ , रहे भरा ज्ञान भंडार
मैं वारी जाऊँ ....

ध्यान योग में ख़ुद को तपाया -२ , बने आसुमल से आसाराम
मैं वारी जाऊँ ....

नाथ सुनाऊँ अनुभव अपना -२ , हो गया हरि से प्यार
मैं वारी जाऊँ ....

हम भी बापू बालक तेरे -२ , "शुभ" चरणों में पावे वास
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....

Sant Kabirji & the Newly Wed Girls

Two young married girls were once walking along the road and talking among themselves. They were newly weds and were narrating the qualities of their husbands to each other.

One of them said, “Dear friend! My husband is of such a sweet nature that I sometimes even call him ‘Yaar’. My ‘Yaar’ is so nice that he even bought a nathini (nose-ring) for me. Look how beautiful my nathini is and how well it dazzles (shines).” She was thus singing the glories of the nathini (nose-ring) and her husband to her fellow friend.

Sant Kabirji was, coincidentally, travelling along the same road behind these girls, and overheard their conversation. He took pity on them, as to how innocent minded these girls were. He called them and said:

O Daughters! Listen to me.

नथिनी दीनी यार ने, स्मृति बारम्बार |
नाक दियो करतार ने, वाको दिया बिसार ||

Translation:

The nose-ring was given by your husband, this you reminisce time and again,
Your nose was however given by the Lord, Him you have forgotten.

Without the nose, would you have put the nose ring in your head or your mouth?

If the All-pervading Lord leaves your body, all your close friends and family members will desert you, and consign your body to flames (or bury it). If the wife or husband will then even touch the ashes/remains of your body, they will become impure, and will need to take a bath to become pure (pavitr) again.

Sant Kabir ji says:

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |
सिर दीजे सतगुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

Translation: This world is a poisonous tree bearing poisonous fruits, and the Guru is a never ending source of nectar. It is a cheap bargain, even if you can get a Guru by offering your head.

Note: When Sant Kabir ji talks of devotion and sacrificing one's head, he indicates towards the path of surrender (of ego).

मत कर रे गर्व गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेगो |
उड़ी जावेगो रे, भाया, फीको पड़ी जावेगो, पाछो नहीं आवेगो ||
मत कर रे गर्व गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेगो |

Translation:

Do not have pride over the beauty of the body as it is ephemeral (transient). The beauty of the body will wither in due course of time and will not come back. Hence, do not nurture false pride over it.

Your son, daughter, wife, husband, shop, power and even your body will desert you, but the Lord never deserts you. One who never parts company with you, accept Him as verily your own. Love Him alone, and conduct yourself with others considering Him to be present in them.

(This article has been prepared based on excerpts from the Satsang of Param Pujya Sant Shri Asaramji Bapu.)

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Endearingly called 'Bapu ji' (Asaram Bapu Ji), His Holiness is a Self-Realized Saint from India. Pujya Asaram Bapu ji preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being, be it Hindu, Muslim, Christian, Sikh or anyone else. Pujya Bapu ji represents a confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga. For more information,

बुधवार, 5 मई 2010

क्यों पैसा पैसा करता है .....

महामूर्ख कौन ?
26 जून 1958, नैनिताल।

आश्रम में पूज्य स्वामी जी थोड़े से भक्तों के सामने सत्संग कर रहे थे,

तब एक गृहस्थी साधक ने प्रश्न पूछाः

“गृहस्थाश्रम में रहकर प्रभुभक्ति कैसे की जा सकती है?”



पूज्य स्वामी जी ने प्रश्न का जवाब देते हुए एक सार गर्भित वार्ता कहीः


“ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था। वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था।

रोज सुबह उठकर पूजा-पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था।

उसके बाद वह दुकान में काम करने जाता।

दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था।

बाकी के समय में वह साधु-संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु-संग एवं दान-पुण्य करता।

व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।

उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते।

लोग कहतेः

‘यह तो महामूर्ख है। कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है।

फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है।

सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा-पाठ में गँवा देता है। यह तो पागल ही है।’

एक बार गाँव के नगरसेठ ने उसे अपने पास बुलाया।

उसने एक लाल टोपी बनायी थी। नगरसेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः

‘यह टोपी मूर्खों के लिए है। तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा,

इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ। इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे

तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।’

ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया।

एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा। ज्ञानचंद उससे मिलने गया

और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे। नगरसेठ ने कहाः

‘भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।’


ज्ञानचंद ने पूछाः ‘कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो?


वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं?


आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा कि नहीं?’



‘भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा? कोई भी साथ नहीं आने वाला है। अकेले ही जाना है।



कुटुंब-परिवार, धन-दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है।



आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।’



सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी



वह लाल टोपी नगरसेठ को वापस देते हुए कहाः



‘आप ही इसे पहनो।’



नगरसेठः ‘क्यों?’



ज्ञानचंदः ‘मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति,



मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा,



भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे क्यों बरबाद कर दी?





सुख में आन बहुत मिल बैठत रहत चौदिस घेरे।



विपत पड़े सभी संग छोड़त कोउ न आवे नेरे।।



जब कोई धनवान एवं शक्तिवान होता है तब सभी ‘सेठ… सेठ…. साहब… साहब…’





करते रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए आपके आसपास घूमते रहते हैं।





परंतु जब कोई मुसीबत आती है तब कोई भी मदद के लिए पास नहीं आता।





ऐसा जानने के बाद भी आपने क्षणभंगुर वस्तुओं एवं संबंधों के साथ प्रीति की, भगवान से दूर रहे



एवं अपने भविष्य का सामान इकट्ठा न किया तो ऐसी अवस्था में आपसे महान् मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है?



गुरु तेगबहादुर जी ने कहा हैः

करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ के फंध।





नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध।।



सेठ जी ! अब तो आप कुछ भी नहीं कर सकते।



आप भी देख रहे हो कि कोई भी आपकी सहायता करने वाला नहीं है।’



क्या वे लोग महामूर्ख नहीं हैं जो जानते हुए भी मोह-माया में फँसकर ईश्वर से विमुख रहते हैं?



संसार की चीजों में, संबंधों का संग एवं दान-पुण्य करते हुए जिंदगी व्यतीत करते तो



इस प्रकार दुःखी होने एवं पछताने का समय न आता।”



लीला शाह जी महाराज के सत्संग परवचन से...
26 जून 1958, नैनिताल।

सोमवार, 3 मई 2010

जीवन की मांगे......

नझरो से वो निहाल कर देते है ,जो संतो के नझरो मे आ जाते है…

ब्रह्मज्ञानी कि दृष्टी अमृत वर्षी l

ब्रह्म ज्ञानी कि मत कौन बखाने ll

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता….l

ब्रह्मज्ञानी पूर्ण पुरुष विधाता..ll

नानक ब्रह्मज्ञानी सब का ठाकुर …..



…आप कैसे ज्ञानी मुनियों कि संतान हो…क्यो मेरा मेरा करना?..

छुटनेवाली वस्तुओ के लिए मरना..

मकान मेरा तो मकान मरने के बाद साथ मे चलेगा क्या?

फायदा हुआ तो पत्नी खुश हूई , कर्मचारी खुश हुये अच्छा है ,

लेकिन घाटा हुआ तो भी बोलो , ” अच्छा है ” ,

एक दिन जब शरीर ही नही रहेगा तो शरीर के लिए होनेवाले घाटे से क्या रोना?

जो होगा देखा जाएगा..ऐसी सोच बना लो..तो ऍहै !!!!!! …..

शरीर को पंच महाभुतो का अधिश्ठान चाहिऐ , फिर भी मरेगा ….

हम उसके बाद भी रहेंगे .. तो ऍहै !!!!!! …..

ऐसा कर के भगवान मे विश्रांति पाओ ….

.. तो आप के जीवन की ३ मांगे है ;-

स्वाधीनता , प्रेम और विश्रांति..

तो जो भी करो प्रभु के लिए करो..

प्रभु के नाते सब से मिलो..

ईमानदारी से व्यवहार करो तो प्रेम भी आएगा ,

विश्रांति भी आएगी…अपार सुख ..सच्चा सुख मिलेगा …

भगवान का स्मरण प्रीति पूर्वक करो वो ही सच्चा सुख है..…



bapuji k satsang parvachan se......



wah bapu wah .....

kese kese samjate ho.....

ab bhi jo na samja wo murkh hai...

dhanbhag humare jo humne bapuji jese sadguru paye....

jai ho....

hariom...


kamal hirani..

dubai....

राम करेंगे तेरे सब काम .....

1.माँ ने एक रोज़ मुझसे कहा था
करता चल सबसे राम राम
यश पायेगा दुनिया में तू
राम करेंगे तेरे सब काम .....

2.खुद के लिए सब जीते है
तू ओरो के हित अब जी ले
अमृत चाएगी ये दुनिया
तू दुनिया भर का विष पीले

3.जिसने जग का विष पि डाला
शंकर वाही बना अभिराम
माँ ने मुझसे एक रोज़ कहा था
करता चल सबसे राम राम ....

4. स्वर्ग एक कल्पना मन की
पा सकता है अपने अन्दर
जिस दिन जीतेगा तू खुद को
बन जायेगा पूर्ण सिकंदर .......

5.मेरी गोद में है सब पगले
जो तू ढूंढे सुबहो-शाम
यश पायेगा दुनिया में तू
राम करेंगे तेरे सब काम .....


6.इश्वर को उसने ही पाया
जिसने मुझको देखा जग में
माँ की ऊँगली पकर चला जो
कभी नही भटका वो मग में .....


7.चलना ही जीवन है पगले ....
चल गंगा-जल सा अविराम
यश पायेगा तू दुनिया में
राम करेंगे तेरे सब काम .....

hariom...........4-5-2010

शनिवार, 1 मई 2010

जिंदगी का सच......

अरे ! तू मरने के लिए जन्मा था कि मुक्त होने के लिए जन्मा था ?

तुम पैदा हुए थे मुक्त होने के लिए। तुम पैदा हुए थे अमर आत्मेदव को पाने के लिए।

"पढ़ते क्यों हो ?"

"पास होने के लिए।"

"पास क्यों होना है ?!"

"प्रमाणपत्र पाने के लिए।"

"प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?"

"नौकरी के लिए।"

"नौकरी क्यों चाहिए ?"

"पैसे कमाने के लिए।"

"पैसे क्यों चाहते हो ?"

"खाने के लिए।"

"खाने क्यों चाहते हो ?"

"जीने के लिए।"

"जीना क्यों चाहते हो ?"

"................"

कोई जवाब नही। कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः "मरने के लिए।"

अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है।

मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है।

वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए।

मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है।

राग ही आदमी को बेईमान बना देता है, राग ही धोखेबाज बना देता है,


राग ही चिन्तित बना देता है, राग ही कर्मों के बन्धन में ले आता है।

रागरहित होते ही तुम्हारी हाजिरी मात्र से जो होना चाहिए वह होने लगेगा,

जो नहीं होना चाहिए वह रूक जाएगा। रागरहित पुरूष के निकट हम बैठते हैं

तो हमारे लोभ, मोह, काम, अहंकार शान्त होने लगते हैं,

प्रेम, आनन्द, उत्साह, ईश्वर-प्राप्ति के भाव जगने लग जाते हैं।

उनकी हाजरी मात्र से हमारे हृदय में जो होना चाहिए वह होने लगता है, जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होता।

राग रहित होना माने परम खजाना पाना। रागरहित होना माने ईश्वर होना।

रागरहित होना माने ब्रह्म होना।

आजकल तो सब दरिद्र मिलते है। धन तो है लेकिन दिल में शान्ति नहीं है।

सत्ता तो है लेकिन भीतर रस नहीं है। धन होते हुए हृदय में शान्ति नहीं है....


. वे कंजूस, धन के गुलाम, धन में राग वाले, सत्ता में राग वाले,

परिवार में रागवाले सफल दरिद्र हैं।

इन चीजों को बटोरकर सुखी हो जाना चाहते हैं वे मूर्ख हैं।

कबीरा इह जग आयके बहुत से कीने मीत।

जिन दिल बाँधा एक से वो सोये निश्चिन्त।।

रागरहित हुए तो एक परमात्मा का साक्षात्कार हो गया,

वे निश्चिन्त हो गये। फिर उनकी मृत्यु उनकी मृत्यु नहीं है,


उनका जीना उनका जीना नहीं है। उनका हँसना उनका हँसना नहीं है।


उनका रोना उनका रोना नहीं है। वे तो रोने से, हँसने से, जीने से, मरने से बहुत परे बैठे हैं।


न तद् भासते सूर्यो न शशांको न पावकः।

यद् गत्वा न निर्वतन्ते तद् धाम परमं मम।।

'जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते,

उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है।'

(भगवद् गीताः 15.6)

रागरहित पुरूष उस परम धाम को प्राप्त हो जाते हैं।


बस, इतना ही काम है जो चुटकी बजाते पूरा हो जाय।

ऐसा नही कि कुछ करेंगे तब परम धाम में जाने के लिए विमान आयगा।

अरे, विमानवाले धाम में तो खतरा है। पुण्य क्षीण होते ही मृत्युलोक में वापस।

क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।

परम धाम में तो आवागमन और वायदे की तो बात ही नहीं।


मूंआ पछीनो वायदो नकामो को जाणे छे काल।

आज अत्यारे अब घड़ी साधो जोई लो नगदी रोकड़ माल।।