मंगलवार, 28 सितंबर 2010

'अच्छी संगति'


सत्संगति का अर्थ है 'अच्छी संगति' ।

मानव के लिये समाज में उच्च स्थान पाने के लिये सत्संगति उतनी ही ज़रूरी है

जितनी कि जीवित रहने के लिये रोटी ।

बुरे व्यक्ति का समाज में बिलकुल भी सम्मान नहीं होता

और ऐसे व्यक्ति की संगति में रहने से कोई भी अच्छाई की राह से भटक सकता है।

अतः हर मानव को कुसंगति से दूर रहना चाहिये।

सत्संगति ही जीवन की सच्ची राह को प्रदर्शित करती है।

मनुष्य को अच्छाई-बुराई, ऊँच-नीच, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य

और पाप-पुण्य आदि में चुनने की समझ देती है।

कुसंगति मानव को पतन की ओर ले जाती है,

यह क्रोध, मोह, काम, अहंकार व लोभ को जन्म देती है।

कई बार तो कोई बुराई न होने पर भी बुरी संगति की वजह से मनुष्य को दोषी ठहरा दिया जाता है

और सत्संगति नकारे व्यक्ति को भी जीवन की सही राह पर धकेल देती है।

भीष्म-पितामह,आचार्य-द्रोण और दुर्योधन जैसे वीर पुरुष भी कुसंगति के कारण राह भटक गये थे।

इसीलिये हर मनुष्य को चन्दन के वृक्ष की तरह अटल रहना चाहिये

जो कि विषैले साँपों से घिरे रहने पर भी सदा महकता रहता है।

सत्संगति कुन्दन है। इसको पाने के बाद काँच के समान मानव भी हीरे की तरह चमक उठता है।

अतः आज के युग में प्रगति का यही सही रास्ता है ।

मानव को सज्जन व्यक्तियों की संगति से जीवन को सार्थक बनाना चाहिये

और सदा आदर प्राप्त करना चाहिये। सत्संगति का अर्थ है 'अच्छी संगति' ।


मानव के लिये समाज में उच्च स्थान पाने के लिये सत्संगति उतनी ही ज़रूरी है

जितनी कि जीवित रहने के लिये रोटी ।बुरे व्यक्ति का समाज में बिलकुल भी सम्मान नहीं होता

और ऐसे व्यक्ति की संगति में रहने से कोई भी अच्छाई की राह से भटक सकता है।

अतः हर मानव को कुसंगति से दूर रहना चाहिये।

सत्संगति ही जीवन की सच्ची राह को प्रदर्शित करती है।

मनुष्य को अच्छाई-बुराई, ऊँच-नीच, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य और पाप-पुण्य आदि में चुनने की समझ देती है।

कुसंगति मानव को पतन की ओर ले जाती है,

यह क्रोध, मोह, काम, अहंकार व लोभ को जन्म देती है।

कई बार तो कोई बुराई न होने पर भी बुरी संगति की वजह से मनुष्य को दोषी ठहरा दिया जाता है

और सत्संगति नकारे व्यक्ति को भी जीवन की सही राह पर धकेल देती है।


भीष्म-पितामह,आचार्य-द्रोण और दुर्योधन जैसे वीर पुरुष भी कुसंगति के कारण राह भटक गये थे।

इसीलिये हर मनुष्य को चन्दन के वृक्ष की तरह अटल रहना चाहिये जो कि विषैले साँपों से घिरे रहने पर भी सदा महकता रहता है।सत्संगति कुन्दन है। इसको पाने के बाद काँच के समान मानव भी हीरे की तरह चमक उठता है।


अतः आज के युग में प्रगति का यही सही रास्ता है ।


मानव को सज्जन व्यक्तियों की संगति से जीवन को सार्थक बनाना चाहिये और सदा आदर प्राप्त करना चाहिये।

शनिवार, 25 सितंबर 2010

क्या झक मारा पुरुषार्थ कर के ?

सबके दिल में दिलबर है

सबका मंगल ,सबकी उन्नति ,

और सबके मंगल में अपना परम मंगल जगाना ..

ये पुरुषार्थ है … * पुरुषार्थ भी हो पर शास्त्र और संत सम्मत पुरुषार्थ हो …

अभी तो दुनिया के सरे लोग पुरुषार्थ कर रहे हैं ,

पर पहले से ज्यादा अशांति है , पहले से ज्यादा झगडे हैं ,

पहले से ज्यादा असुरक्षा है , पहले से ज्यादा बीमारी है ,

क्या झक मारा पुरुषार्थ कर के ?

दूसरे का दुःख हरने में लग जाओ ..




तो आपके दुःख दुखहारी हरी के आनंद से नन्हा हो जायेगा ,

दूसरे को सुखी देख कर आप सुखी रहे तो ,

आपको सुखी रहने की मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी

मुफ्त में आपका ह्रदय सुखी होगा इसका नाम पुरुषार्थ है ….

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें २ सितम्बर 2010


Gokul me jo kare niwas,
Gopiyo sang jo rachaye raas,
Devki-Yashoda jinki maiya,
aise hamare kishan kanhaiya.
May Krishna fulfill all your wishes.
Happy Janamasthami!

*********************************

Murli Manohar,Brij ke Dhrohar…
Murli Manohar,Brij ke Dhrohar.
Wo Nandlala Gopala,Bansi Ki Dhun Par Sabke Dukh HarneWala.
Sab Milkar Machaye Dhoom Ki Krishna Ane Wala Hai

*****************************************

Krishna jinka nam,gokul jinka dham,
ase SHREE KRRISHN bhagwan ko,ham sab ka pranam.
JANMASTHMI KI SHUB KAMNAYE.
Jai shree krishna


Mathura ki khushbu gokul ka haar,
brindaban ki sugandh
brijj ki fuhaar,
radha ki ummid or khanhaiya ka pyaar,
Mubarak ho aapko janmastami ka tyohaar.
Wish U Very Happy Janamastami.

May the Natkhat Nandlal always give you
many reasones to be Happy and
you find peace in Krishne consciousness.
Happy Janmashtami..


dahi ki handi barish ki fuhar,
makhan churane aaye nandlal ,
mubarak ho apko
janamasthmi ka ye tyohar happy janamasthmi

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

पूज्य बापू का पावन सन्देश.....



हम धनवान होगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परंतु भैया !

हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका है?

विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है,

गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है

परंतु इस जीवन की गाड़ी छूटने का कोई निश्चित समय है?


आज तक आपने जगत में जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है....

आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया !

वह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जायेगा,

जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।


अतः सावधान हो जाओ।

अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को,

शाश्वत शांति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो

जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ।





सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है।

अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके।

अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं

जो तुम्हें दबा सके।

सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी

बिखरती रहती है।

अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं।

तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ

और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ।

दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो।

विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो।

सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो।

आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को

भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।

वाह बापू वाह ...कितना समजाते हो..

हम नादान फिर भी नही समज पाते...

जय हो....

शनिवार, 24 जुलाई 2010

गुरुपूर्णिमा २०१०

श्री सुरेशानन्दजी महाराज सत्संग
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मेरे गुरु सुई की नोक से सुमेरु चलाते है…

अमदावाद आश्रम मे सदगुरूदेव ने केवल संकल्प किया

तो दूसरे दिन अखबार मे आया कि कारगिल के सैनिक चोटी पे पहुंच गए है…








भक्ति होनी चाहिऐ..
तभी मेरे गुरु क्या है,

ये भक्त के समझ मे आएगा..
कायरता नही होनी चाहिऐ ,
वीरता होनी चाहिऐ !


फौलादी है बाहें मेरी
चट्टान को भी तोड़ सकती ..”


ऐसा विश्वास होना चाहिऐ…

सदगुरूदेव कौन है ये जानो…
महाभारत मे आता है,



कि अर्जुन युध्द के मैदान मे हथियार डालकर बैठ गए..
तो श्रीकृष्ण भगवन ने ऐसा नही कहा कि चलो ,


उठाओ धनुष….बलकि अर्जुन को युध्द के मैदान मे सत्संग सुनाया..

परिणाम ये आया कि अर्जुन युध्द जित गए…


अभी भी बापूजी आएंगे ,
हमे उनके आशीर्वचन सुनने को मिलेंगे तो हमारा भी कल्याण होगा…


गुरुदेव का आप के सर पे हाथ ....





प्रल्हाद कहते है अपने गुरु(नारद जी) को कि ,
अभी मुझ मे ९ दोष है , हे गुरुदेव.. मेरे सिर पे आप हाथ रख दो”….


आप भी एक प्रयोग करे ….मन से ही सदगुरूदेव के चरणों मे अपना सिर रख दो..
मन से ही ऐसी भावना करो….कि आप ने सदगुरु देव के चरणों मे अपना सिर रखा ….



और सदगुरूदेव ने आप के सिर पे हाथ रखा ,
तो आपकी शक्तिया जो अधोगामी हो रही थी,
उर्ध्वगामी होने लगेंगी…
भावना मे बड़ी शक्ति है…



आप यहा आते तो ऐसा कई बार आप के मन मे आता होगा
कि एक बार सदगुरूदेव के चरण छू लू..




लेकिन इतनी भीड़ मे ये कैसे संभव होगा ?



सेवाधारी तो आप को नजदीक भी नही आने देंगे…
लेकिन आप मन से भावना करो तो रोज सुबह अपने ही घर मे भी आप भावना कर के
सदगुरूदेव के चरणों मे सिर रखो
और उन्होने आप के सर पे हाथ रखा ऐसा अनुभव कर लो….



प्रेम की बोली


हमारे सदगुरू सुई की नोक से सुमेरु चलाते ये तभी जान पाते है जब भगवान को पहेचाने..
उसके लिए भक्ति हो ,
श्रध्दा हो..

और भक्ति कैसी हो
नामदेव जैसी हो..
गोरक्षनाथ जैसी हो…

तभी जान पाते है कि , मेरे सदगुरू कौन है?

(सुरेश बापजी श्लोक बोल रहे है..)












मेरे सदगुरू बिना पैरो के सारे जगत मे जाकर आये…
बिना कर(हाथ) के करम करे….
बिना कान के सब सुन लेते है..ऐसे मेरे सदगुरूदेव है…




हर राज्य की एक बोली होती है..
जैसे महाराष्ट्र की मराठी, पंजाब की पंजाबी ,
गुजरात की गुजराथी बंगाल की बंगाली..
है ना ?



ऐसे प्रेम राज्य की भी एक बोली होती है ,
जो कानो से नही सुनी जाती ..
ह्रदय के माध्यम से सुनी जाती है…मुँह से नही बोली जाती ,
आंखो से बोली जाती है….




जयश्री बहेन का अनुभव

एक घटना सुनाता हूँ..

स्कूल मे वार्षिक उत्सव था…कार्यक्रम चल रहा था,
अचानक आग लगी…
बाहर जाने के लिए एक ही दरवाजा और कम्पौंड की दीवार १० फ़ीट ऊँची…

एक बहेन अपने २ बच्चो को लेकर भाग रही इधर...उधर..
१० फ़ीट ऊँची दीवार ..दोनो बच्चो को लेकर कैसे जाये?

कैसे भी दोनो बच्चो को उठाकर दीवार के उसपार फेका..

लेकिन खुद कैसे दीवार से कुदे?..
बहेन का शरीर भारी था…जयश्री उस बहेन का नाम है

आग कंधे तक आ गयी ..लपेटे बढ़ने लगी ..
बहेन ने दीक्षा ली हुयी थी.. गुरुमंत्र का जप करती रही..

कोई बात नही भगवान रखे तो तेरी मर्जी..
उठा लो तेरी मर्जी..
जैसा नाच नचा ले प्रभु..

साडी जली ..चमडी जली..
बहेन गुरुमंत्र जप करती रही..

अचानक किसी अदृश्य शक्ति ने बहेन को उठाकर दीवार के उसपार फ़ेंक दिया..

बहेन को जरासी चोट आई और थोडी चमडी जली थी बस..

बापूजी ने अदृश्य शक्ति के रुप मे बचाया….




नास्तिक लोग नही मांगेंगे..
न माने तो उनकी मर्जी…

सीता माता के लिए साक्षात् अग्निदेव ने प्रगट होकर बताया था कि ,
सीता माता पवित्र है फिर भी धोबी नही माना…
साक्षात् अग्निदेव के प्रमाण को भी नही माना..

ऐसे ही उल्लू नही मानता कि सूरज उगा है..
नही मानता तो नही माने..आँख बंद करके बैठे
इस युग मे भी ऐसा हो रहा है..

जो लोग नही मानते तो ना माने ..
घाटा किसको हो रहा है?

आज आयोजन पुरा होगा...
जप-तप -सेवा मे लगे रहे..
साधन -भजन -सुमिरन करते रहे…


और अहमदावाद , सूरत आश्रम मे कही ध्यान योग शिविर लगा तो अवश्य अटैँड करे..
आश्रम की धरती पे बैठने मात्र से अद्भुत लाभ होते है…
साधना मे और भी उन्नत होंगे…

(सुरेश महाराज कोई श्लोक बोल रहे है…)


जिन्होंने अपनी आंखो से ईश्वर प्राप्त महापुरुषों का दर्शन नही किया
उसके आंखो मे क्षार पड़े
क्षार याने तेजाब ..
एसिड होता है.
मने व्यर्थ है ऐसी आँखे…


भूल न जाऊ तुम्हे कही ये बिनती बारं बार........

भूल न जाऊ तुम्हे कही ये बिनती बारं बार...........

कभी न होता किसी के लिए बंद तुम्हारा द्वार............


भूल न जाऊ तुम्हे कही ये बिनती बारं बार ............



हरी ओम…

कही कही ना सुनाओ

सोयी पुंज पाए है जो भक्ति करे चित्त लाये ...
जरामरण से छूटी पड़े अजर अमर हो जाये ...
जो तेरे घट प्रेम है, तो कही कही न सुनाओ ...
अंतर्यामी जाने है अंतर घट के भाव...


अपने अन्दर प्रेम है..

भक्ति है तो किसी को सुनाने से क्या मिलेगा?








अंतर्यामी है वो सब जानते है…



अन्दर के अंतर्यामी मे से अंतर कैसा रहेगा ?


ह्रदय की गहराई मे जो बैठे है उनसे अंतर कैसा रहेगा ?


वो अन्दर ही है सब जानते है..



इसलिए कही कही नही सुनाओ ..

मैंने ऐसा सुमिरन किया , अनुष्टान किया …इतना पाठ किया..


सुमिरन ऐसा कीजिए ...दूजा कहे न कोई...

होठ न प्रकट देखिए ...प्रेमे जपियो कोई ...

जहा जहा बछड़ा फिरे ...तहा तहा फिरे है गाय ...

कहे मल्लुक जहा संतन...तहा रामैय्या जाये....


मलूक जी कहते है कि जहा भक्त पुकारते वह संत चले जाते…
जैसे गाय अपने बछड़े के पीछे पीछे जाती..

अब पेतलावाद के साधक और रतलाम के साधको का खूब खूब प्रेम था
तो सदगुरूदेव यहा पधारे है…

सुरेश बापजी के सत्संग प्रवचन से...



गुरु पूर्णिमा पर्व की सभी साधक भाई-बहनों को खूब-खूब बधाई ...




हरिओम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्

रविवार, 18 जुलाई 2010

मैं बीडी,सिगरेट, घुटखा, का बहुत ज्यादा सेवन करता था ...

पहेले मैं बीडी ,सिगरेट, घुटखा,जर्दा का बहुत ज्यादा सेवन करता था ...

इससे मेरा मुह ख़राब हो गया ...

और बोलना भी कठिन हो रहा था .....

पूज्य बापूजी की योवन सुरक्षा भाग २ पुस्तक मेने पड़ी .....



और उस दिन से मेरा नशा छुट गया

इस पुस्तक ने मुझे निवार्श्यी बना दिया

पहेले मेरा स्वभाव बहुत गुस्से वाला था

घर पर रोज़ झगडा होता था,और मेरा मन बहुत उदास रहेता था

पूज्य बापूजी से दीक्षा लेने के बाद मेरा मन और स्वभाव शांत हो गया

कोई भी काम हो पूज्य बापूजी की कृपा से रास्ता अपने आप खुल जाता है

जब भी कोई बड़ा निर्णय लेना होता है

तो बापू जी के श्रीचित्र के सामने ७-८ मिनट एकटक देखते हुए ॐ ॐ जपते हुए

एकाग्रता और अनासक्ति का अवलंबन लेता हु ...

और गुरु भगवन की प्रेरणा से मुझे सब मिल जाता है

भोतिक व्यवहार,भोतिक वातावरण में आत्मिक सम्बन्ध जोड़ने का,

आत्मिक शक्ति से जुड़ने का मुझे सीधा रास्ता ही मिल गया है....

धन्य है एकलव्य की गुरुभक्ति,

जिसने कइयो को प्रेरणा की गुरुकृपा का फायदा उठाने की

श्री रामजी ने गुरुकृपा का फायदा लिया वसिष्ठ जी से...

और वसिष्ठ जी बोलते है योगवसिष्ठ में...

है रामजी मैं बाज़ार से गुजरता हु तो

मुर्ख लोग मेरे लिए न जाने क्या क्या अफ्वाये उड़ाते है ....

तो आज मेरे गुरु देव के लिए बोलने वाले कितना भी भके...





लेकिन हमारा अनुभव नही तोड़ सकते...

गुरु शिष्य के अमर सम्बन्ध को तोड़ने की ताकत कुप्र्चारको मैं कहा??????

कुप्रचार करने वाले भी अगर सुधर जाये तो अथाह फायदा होगा उनको,

मगर ऐसा भाग्य कब होगा उनका????????

हरिओम्म्म्म्म्म्म्

लक्ष्मण सुथार..चिमनपुरा,जिला.पाली (राज.)

एक साधक की जुबानी...

वाह बापू वाह आपने कितनो का ....




केसे केसे भला किया है ...

कितनो की नैया पार लगा दी है आपने बापूजी ....जिसका कोई भखान नही

वाह बापू वाह ....

जय हो...

जपते रहे तेरा नाम जय बापू आशाराम....


ऐ नादान इन्सान एक बार सर झुका के तो देख बापू के दर पे ....

अगर झोली न भर दे तो कहना .....

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

संभोग से सत्यानाश

वासनाक्षय के लिये ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।

कैसा भी योगाभ्यास करने वाला साधक हो, धारणा, ध्यान, त्राटक आदि करता हो,

लेकिन यदि वह ब्रह्मचर्य का आदर नहीं करता, संयम नहीं करता तो उसका योग सिद्ध नहीं होगा।

साधना से लाभ तो होता ही है लेकिन ब्रह्मचर्य के बिना उसमें पूर्ण सफलता नहीं मिलती।

जो लोग 'संभोग से समाधि' वाली बातों में आ गये हैं वे सब रोये हैं।

संभोग से समाधि नहीं होती, संभोग से सत्यानाश होता है साधना का।

बड़े-बड़े योगी भी संभोग की ओर गये हैं तो उनका पतन हुआ है फिर भोगी की क्या बात करें?

संभोग से यदि समाधि उपलब्ध होती तो करोड़ों मनुष्य कर ही रहे हैं, कीट-पतंग जैसा जीवन बिता रहे हैं।

समाधि किसकी लगी? आज तक इस प्रकार किसी को समाधि न लगी है न कभी लगेगी।


राम के सुख के बाद संसार में यदि अधिक-से-अधिक आकर्षण का केन्द्र है तो वह काम का सुख है।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँचों विषयों में स्पर्श का आकर्षण बहुत खतरनाक है।

व्यक्ति को कामसुख बहुत जल्दी नीचे ले आता है।

बड़े-बड़े राजा-महाराजा-सत्ताधारी उस काम-विकार के आगे तुच्छ हो जाते हैं।

काम-सुख के लिये लोग अन्य सब सुख, धन, वैभव, पद-प्रतिष्ठा कुर्बान करने के लिये तैयार हो जाते हैं।

इतना आकर्षण है काम-सुख का।

राम के सुख को प्राप्त करने के लिए साधक को इस आकर्षण से








अपने चित्त को दृढ़ पुरुषार्थ करके बचाना चाहिये।







जिस व्यक्ति में थोड़ा-बहुत भी संयम है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है




वह धारणा-ध्यान के मार्ग में जल्दी आगे बढ़ जायेगा।





लेकिन जिसके ब्रह्मचर्य का कोई ठिकाना नहीं ऐसे व्यक्ति के आगे साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण आ जायें,


भगवान विष्णु आ जायें, ब्रह्माजी आ जायें, माँ अम्बाजी आ जायें,


सब मिलकर उपदेश करें फिर भी उसके विक्षिप्त चित्त में आत्मज्ञान का अमृत ठहरेगा नहीं।


जैसे धन कमाने के लिए भी धन चाहिये, शांति पाने के लिये भी शांति चाहिये,


अक्ल बढ़ाने के लिये भी अक्ल चाहिये, वैसे ही आत्म-खजाना पाने के लिये भी आत्मसंयम चाहिये।


ब्रह्मचर्य पूरे साधना-भवन की नींव है। नींव कच्ची तो भवन टिकेगा कैसे?



सत्संग प्रवचन से....