शुक्रवार, 7 मई 2010

मंत्र दीक्षा के लाभ.........

मंत्र दीक्षा से बहोत फायदे होते है..



1.चोरासी के फेरे से छूटते ..



2.आप की नाडियों पे गुरु मंत्र का प्रभाव पड़ता है…



कयादु के पेट मे प्रल्हाद को नारद जी से मंत्र मिला , सत्संग मिला तो ऐसा प्रभाव हुआ कि ,



बालक प्रल्हाद भक्त शिरोमणि हो गया…



3.गर्भस्त शिशु पे भी सत्संग का और गुरु मंत्र का बहोत अच्छा प्रभाव पड़ता है…



सत्संग का प्रभाव अपरम्पार है…



आत्मज्ञानी गुरु के मंत्र का जाप करे और गुरु ज्ञान का चिंतन करे तो क्या कहेना….!!

…जिन्होंने मंत्र दीक्षा ली है और नियम से साधना करते है



तो उनको सुख दुःख का प्रभाव पहले जैसा बहाता नही है..जरजरा बात मे इतनी अशांति नही होती…



ऐसे कई साधक है , जिनको बाईपास नही करनी पड़ी..



हाई लो बीपी की तकलीफ दूर हो गयी…पीलिया(जौंडीस) जैसे रोग ठीक हो जाते..



स्वास्थ्य ठीक रहता , आर्थिक समस्या मिटती ..



ऐसे अवांतर तो कई फायदे होते ही है…लेकिन पक्के ३३ प्रकार के फायदे तो होते ही है…





..शिव जी ने पार्वती को वामदेव गुरु से दीक्षा दिलाई



और माँ पार्वती को दीक्षा से बहोत फायदे महेसूस हुए ,



तो माँ पार्वती ने बहोत भारी स्तुति की है….



..कलकत्ता की काली माँ के रामकृष्ण परम हंस बहोत भक्त थे…



माँ को खिलाते तो पहले खुद चखते कि नमक आदि ठीक है कि नही.



.उनका सुंघा हुआ फूल माँ को चढाते…उनके सामने काली माँ साक्षात् प्रगट होती थी..…



लेकिन काली माँ ने रामकृष्ण को कहा कि “ ठाकुर , तोतापुरी गुरु से दीक्षा ले लो..”




रामकृष्ण बोले कि, “माँ , मुझे दीक्षा लेने की क्या जरुरत? मैं याद करता हूँ ,



तो आप साक्षात् प्रगट होती हो…!”


काली माँ ने कहा कि , “ तुम भाव के गहराई से याद करते तो मैं प्रगत होती हूँ..



लेकिन भाव बदलता तो अदृश भी हो जाती हूँ …..



भाव के गहराई मे जो तत्व है उसका ज्ञान तो तुम्हे गुरु कृपा से प्राप्त होगा…”



रामकृष्ण जी ने तोतापुरी गुरु जी से परम ज्ञान पाया….





..ऐसे ही महाराष्ट्र मे संत नामदेव को भी भगवान विठ्ठल ने प्रगट होकर बताया कि शिवबा खेचर से दीक्षा लो…



नामदेव ने शिवबा खेचर से दीक्षा ली और आत्म ज्ञान पाकर परम तत्व मे विश्रांति पाई..





..मुझे भी २२ साल की उमर मे लगता था कि मैंने बहोत कुछ पा लिया है..



लेकिन जब गुरु से मिला तो जाना कि अभी तक जो कुछ किया वो तो कुछ भी नही था…!



..गुरु कृपा से ही बहोत ऊँची स्थिति प्राप्त कर सकते है…



“गुरु कृपा ही केवलं , शिष्यस्य परम मंगलम !”



दीक्षा लेनी है तो २ शर्त माननी होती है कि , मुझे कुछ भी नही देना है ..



रुपिया, पैसा, फल, फूल कुछ भी नही ,



क्यो कि मुझे इसकी जरुरत नही और साल भर मे ४/५ बार ध्यान योग शिबिर लगते रहते है



तो एक शिबिर मे आना है ..शिबिर मे बौध्दिक जगत मे प्रवेश कराया जाता है…



विद्यार्थियोंको सारस्वत्य मंत्र दिया जाता है , जिससे उनकी बुध्दी चमक जाती है, ऐसे कई बच्चे तेजस्वी बने है….




..कल सुबह कुछ खाना पीना नही है , पानी पी सकते है..कल इतवार है ..



तुलसी के पत्ते इतवार को नही तोड़ते और अन्य दिन भी दोपहर के १२ बजे के बाद नही तोड़ना है..



कल तुलसी के पत्ते नही खाना है…


..दीक्षा से ही आधी साधना हो जाती है…



जब आत्मज्ञानी गुरु से चेतन मंत्र मिलता तो जैसे पॉवर होउस से कोंनेक्टर मिलता है..



कबीर जी को रामानंद स्वामी जैसे समर्थ गुरु मिले तो परम सिध्द तत्व मे जीते थे…



ध्रुव को नारद जी दीक्षा मिली थी…




..गुरु से जो मंत्र मिलता है वो किसी को बताया नही जाता…




..जाप करने कि भी ४ अवस्था होती है..



शुरू शुरू मे स्पष्ट रूप से बोला जाता है…



धीरे धीरे होठ बंद करके मंत्र का जाप होता है..



फिर कंठ मे जपना शुरू हो जाता है…



और मंत्र जाप से आनंद आने लगता है तो ह्रदय मे जप होने लगता है..




नारायण नारायण नारायण नारायण
ॐ शांति…
देखा इतने महान है मेरे बापूजी जिनको दीक्षा में भी कुछ नही चाइए ...

ऐसा कोई गुरु देखा जो फूल तक से इंकार करे....

जी हा वो दीक्षा देते है हमारी भलाई के लिए...

तो फिर देर किस बात की इस बात से हे समज जाओ की जिनको आप से एक फूल तक नही चाइए दक्षिणा में ...

तो वो कितने महान होंगे ....

आओ दोस्तों अपनी जिन्दगी सवारे ....

आओ चले बापूजी से दीक्षा लेने....और अपने जीवन को दे बदल ....

पता नही ऐसा मौका फिर मिले न मिले...

सदगुरूदेव की जय हो!!!!!

(गलातियोंके लिए प्रभुजी क्षमा करे…..)

गुरुवार, 6 मई 2010

मैं वारी जाऊँ ....

पिता थाऊमल के घर जन्मे -२ , तेरी जय हो मेह्गिबा के लाल
मैं वारी जाऊँ ....
मैं वारी जाऊँ बापू जी , बलिहारी जाऊँ बापू जी

मोटेरा तेरा धाम है -२ , तेरे भक्त आवे दरबार
मैं वारी जाऊँ ....

भक्तो के तुम कष्ट मिटते -२ , तेरी महिमा अपरम्पार
मैं वारी जाऊँ ....

भक्त जो नाम दान हैं लेते -२ , वो तर जावें भव पार
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....

आप तो बापू ज्ञान बांटते -२ , रहे भरा ज्ञान भंडार
मैं वारी जाऊँ ....

ध्यान योग में ख़ुद को तपाया -२ , बने आसुमल से आसाराम
मैं वारी जाऊँ ....

नाथ सुनाऊँ अनुभव अपना -२ , हो गया हरि से प्यार
मैं वारी जाऊँ ....

हम भी बापू बालक तेरे -२ , "शुभ" चरणों में पावे वास
मैं वारी जाऊँ बापू जी ....

Sant Kabirji & the Newly Wed Girls

Two young married girls were once walking along the road and talking among themselves. They were newly weds and were narrating the qualities of their husbands to each other.

One of them said, “Dear friend! My husband is of such a sweet nature that I sometimes even call him ‘Yaar’. My ‘Yaar’ is so nice that he even bought a nathini (nose-ring) for me. Look how beautiful my nathini is and how well it dazzles (shines).” She was thus singing the glories of the nathini (nose-ring) and her husband to her fellow friend.

Sant Kabirji was, coincidentally, travelling along the same road behind these girls, and overheard their conversation. He took pity on them, as to how innocent minded these girls were. He called them and said:

O Daughters! Listen to me.

नथिनी दीनी यार ने, स्मृति बारम्बार |
नाक दियो करतार ने, वाको दिया बिसार ||

Translation:

The nose-ring was given by your husband, this you reminisce time and again,
Your nose was however given by the Lord, Him you have forgotten.

Without the nose, would you have put the nose ring in your head or your mouth?

If the All-pervading Lord leaves your body, all your close friends and family members will desert you, and consign your body to flames (or bury it). If the wife or husband will then even touch the ashes/remains of your body, they will become impure, and will need to take a bath to become pure (pavitr) again.

Sant Kabir ji says:

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |
सिर दीजे सतगुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

Translation: This world is a poisonous tree bearing poisonous fruits, and the Guru is a never ending source of nectar. It is a cheap bargain, even if you can get a Guru by offering your head.

Note: When Sant Kabir ji talks of devotion and sacrificing one's head, he indicates towards the path of surrender (of ego).

मत कर रे गर्व गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेगो |
उड़ी जावेगो रे, भाया, फीको पड़ी जावेगो, पाछो नहीं आवेगो ||
मत कर रे गर्व गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेगो |

Translation:

Do not have pride over the beauty of the body as it is ephemeral (transient). The beauty of the body will wither in due course of time and will not come back. Hence, do not nurture false pride over it.

Your son, daughter, wife, husband, shop, power and even your body will desert you, but the Lord never deserts you. One who never parts company with you, accept Him as verily your own. Love Him alone, and conduct yourself with others considering Him to be present in them.

(This article has been prepared based on excerpts from the Satsang of Param Pujya Sant Shri Asaramji Bapu.)

******************************************************************************
Endearingly called 'Bapu ji' (Asaram Bapu Ji), His Holiness is a Self-Realized Saint from India. Pujya Asaram Bapu ji preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being, be it Hindu, Muslim, Christian, Sikh or anyone else. Pujya Bapu ji represents a confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga. For more information,

बुधवार, 5 मई 2010

क्यों पैसा पैसा करता है .....

महामूर्ख कौन ?
26 जून 1958, नैनिताल।

आश्रम में पूज्य स्वामी जी थोड़े से भक्तों के सामने सत्संग कर रहे थे,

तब एक गृहस्थी साधक ने प्रश्न पूछाः

“गृहस्थाश्रम में रहकर प्रभुभक्ति कैसे की जा सकती है?”



पूज्य स्वामी जी ने प्रश्न का जवाब देते हुए एक सार गर्भित वार्ता कहीः


“ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था। वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था।

रोज सुबह उठकर पूजा-पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था।

उसके बाद वह दुकान में काम करने जाता।

दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था।

बाकी के समय में वह साधु-संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु-संग एवं दान-पुण्य करता।

व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था।

उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते।

लोग कहतेः

‘यह तो महामूर्ख है। कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है।

फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है।

सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा-पाठ में गँवा देता है। यह तो पागल ही है।’

एक बार गाँव के नगरसेठ ने उसे अपने पास बुलाया।

उसने एक लाल टोपी बनायी थी। नगरसेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः

‘यह टोपी मूर्खों के लिए है। तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा,

इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ। इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे

तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।’

ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया।

एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा। ज्ञानचंद उससे मिलने गया

और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे। नगरसेठ ने कहाः

‘भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।’


ज्ञानचंद ने पूछाः ‘कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो?


वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं?


आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा कि नहीं?’



‘भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा? कोई भी साथ नहीं आने वाला है। अकेले ही जाना है।



कुटुंब-परिवार, धन-दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है।



आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।’



सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी



वह लाल टोपी नगरसेठ को वापस देते हुए कहाः



‘आप ही इसे पहनो।’



नगरसेठः ‘क्यों?’



ज्ञानचंदः ‘मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति,



मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा,



भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे क्यों बरबाद कर दी?





सुख में आन बहुत मिल बैठत रहत चौदिस घेरे।



विपत पड़े सभी संग छोड़त कोउ न आवे नेरे।।



जब कोई धनवान एवं शक्तिवान होता है तब सभी ‘सेठ… सेठ…. साहब… साहब…’





करते रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए आपके आसपास घूमते रहते हैं।





परंतु जब कोई मुसीबत आती है तब कोई भी मदद के लिए पास नहीं आता।





ऐसा जानने के बाद भी आपने क्षणभंगुर वस्तुओं एवं संबंधों के साथ प्रीति की, भगवान से दूर रहे



एवं अपने भविष्य का सामान इकट्ठा न किया तो ऐसी अवस्था में आपसे महान् मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है?



गुरु तेगबहादुर जी ने कहा हैः

करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ के फंध।





नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध।।



सेठ जी ! अब तो आप कुछ भी नहीं कर सकते।



आप भी देख रहे हो कि कोई भी आपकी सहायता करने वाला नहीं है।’



क्या वे लोग महामूर्ख नहीं हैं जो जानते हुए भी मोह-माया में फँसकर ईश्वर से विमुख रहते हैं?



संसार की चीजों में, संबंधों का संग एवं दान-पुण्य करते हुए जिंदगी व्यतीत करते तो



इस प्रकार दुःखी होने एवं पछताने का समय न आता।”



लीला शाह जी महाराज के सत्संग परवचन से...
26 जून 1958, नैनिताल।

सोमवार, 3 मई 2010

जीवन की मांगे......

नझरो से वो निहाल कर देते है ,जो संतो के नझरो मे आ जाते है…

ब्रह्मज्ञानी कि दृष्टी अमृत वर्षी l

ब्रह्म ज्ञानी कि मत कौन बखाने ll

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता….l

ब्रह्मज्ञानी पूर्ण पुरुष विधाता..ll

नानक ब्रह्मज्ञानी सब का ठाकुर …..



…आप कैसे ज्ञानी मुनियों कि संतान हो…क्यो मेरा मेरा करना?..

छुटनेवाली वस्तुओ के लिए मरना..

मकान मेरा तो मकान मरने के बाद साथ मे चलेगा क्या?

फायदा हुआ तो पत्नी खुश हूई , कर्मचारी खुश हुये अच्छा है ,

लेकिन घाटा हुआ तो भी बोलो , ” अच्छा है ” ,

एक दिन जब शरीर ही नही रहेगा तो शरीर के लिए होनेवाले घाटे से क्या रोना?

जो होगा देखा जाएगा..ऐसी सोच बना लो..तो ऍहै !!!!!! …..

शरीर को पंच महाभुतो का अधिश्ठान चाहिऐ , फिर भी मरेगा ….

हम उसके बाद भी रहेंगे .. तो ऍहै !!!!!! …..

ऐसा कर के भगवान मे विश्रांति पाओ ….

.. तो आप के जीवन की ३ मांगे है ;-

स्वाधीनता , प्रेम और विश्रांति..

तो जो भी करो प्रभु के लिए करो..

प्रभु के नाते सब से मिलो..

ईमानदारी से व्यवहार करो तो प्रेम भी आएगा ,

विश्रांति भी आएगी…अपार सुख ..सच्चा सुख मिलेगा …

भगवान का स्मरण प्रीति पूर्वक करो वो ही सच्चा सुख है..…



bapuji k satsang parvachan se......



wah bapu wah .....

kese kese samjate ho.....

ab bhi jo na samja wo murkh hai...

dhanbhag humare jo humne bapuji jese sadguru paye....

jai ho....

hariom...


kamal hirani..

dubai....

राम करेंगे तेरे सब काम .....

1.माँ ने एक रोज़ मुझसे कहा था
करता चल सबसे राम राम
यश पायेगा दुनिया में तू
राम करेंगे तेरे सब काम .....

2.खुद के लिए सब जीते है
तू ओरो के हित अब जी ले
अमृत चाएगी ये दुनिया
तू दुनिया भर का विष पीले

3.जिसने जग का विष पि डाला
शंकर वाही बना अभिराम
माँ ने मुझसे एक रोज़ कहा था
करता चल सबसे राम राम ....

4. स्वर्ग एक कल्पना मन की
पा सकता है अपने अन्दर
जिस दिन जीतेगा तू खुद को
बन जायेगा पूर्ण सिकंदर .......

5.मेरी गोद में है सब पगले
जो तू ढूंढे सुबहो-शाम
यश पायेगा दुनिया में तू
राम करेंगे तेरे सब काम .....


6.इश्वर को उसने ही पाया
जिसने मुझको देखा जग में
माँ की ऊँगली पकर चला जो
कभी नही भटका वो मग में .....


7.चलना ही जीवन है पगले ....
चल गंगा-जल सा अविराम
यश पायेगा तू दुनिया में
राम करेंगे तेरे सब काम .....

hariom...........4-5-2010

शनिवार, 1 मई 2010

जिंदगी का सच......

अरे ! तू मरने के लिए जन्मा था कि मुक्त होने के लिए जन्मा था ?

तुम पैदा हुए थे मुक्त होने के लिए। तुम पैदा हुए थे अमर आत्मेदव को पाने के लिए।

"पढ़ते क्यों हो ?"

"पास होने के लिए।"

"पास क्यों होना है ?!"

"प्रमाणपत्र पाने के लिए।"

"प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?"

"नौकरी के लिए।"

"नौकरी क्यों चाहिए ?"

"पैसे कमाने के लिए।"

"पैसे क्यों चाहते हो ?"

"खाने के लिए।"

"खाने क्यों चाहते हो ?"

"जीने के लिए।"

"जीना क्यों चाहते हो ?"

"................"

कोई जवाब नही। कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः "मरने के लिए।"

अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है।

मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है।

वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए।

मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है।

राग ही आदमी को बेईमान बना देता है, राग ही धोखेबाज बना देता है,


राग ही चिन्तित बना देता है, राग ही कर्मों के बन्धन में ले आता है।

रागरहित होते ही तुम्हारी हाजिरी मात्र से जो होना चाहिए वह होने लगेगा,

जो नहीं होना चाहिए वह रूक जाएगा। रागरहित पुरूष के निकट हम बैठते हैं

तो हमारे लोभ, मोह, काम, अहंकार शान्त होने लगते हैं,

प्रेम, आनन्द, उत्साह, ईश्वर-प्राप्ति के भाव जगने लग जाते हैं।

उनकी हाजरी मात्र से हमारे हृदय में जो होना चाहिए वह होने लगता है, जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होता।

राग रहित होना माने परम खजाना पाना। रागरहित होना माने ईश्वर होना।

रागरहित होना माने ब्रह्म होना।

आजकल तो सब दरिद्र मिलते है। धन तो है लेकिन दिल में शान्ति नहीं है।

सत्ता तो है लेकिन भीतर रस नहीं है। धन होते हुए हृदय में शान्ति नहीं है....


. वे कंजूस, धन के गुलाम, धन में राग वाले, सत्ता में राग वाले,

परिवार में रागवाले सफल दरिद्र हैं।

इन चीजों को बटोरकर सुखी हो जाना चाहते हैं वे मूर्ख हैं।

कबीरा इह जग आयके बहुत से कीने मीत।

जिन दिल बाँधा एक से वो सोये निश्चिन्त।।

रागरहित हुए तो एक परमात्मा का साक्षात्कार हो गया,

वे निश्चिन्त हो गये। फिर उनकी मृत्यु उनकी मृत्यु नहीं है,


उनका जीना उनका जीना नहीं है। उनका हँसना उनका हँसना नहीं है।


उनका रोना उनका रोना नहीं है। वे तो रोने से, हँसने से, जीने से, मरने से बहुत परे बैठे हैं।


न तद् भासते सूर्यो न शशांको न पावकः।

यद् गत्वा न निर्वतन्ते तद् धाम परमं मम।।

'जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते,

उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है।'

(भगवद् गीताः 15.6)

रागरहित पुरूष उस परम धाम को प्राप्त हो जाते हैं।


बस, इतना ही काम है जो चुटकी बजाते पूरा हो जाय।

ऐसा नही कि कुछ करेंगे तब परम धाम में जाने के लिए विमान आयगा।

अरे, विमानवाले धाम में तो खतरा है। पुण्य क्षीण होते ही मृत्युलोक में वापस।

क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।

परम धाम में तो आवागमन और वायदे की तो बात ही नहीं।


मूंआ पछीनो वायदो नकामो को जाणे छे काल।

आज अत्यारे अब घड़ी साधो जोई लो नगदी रोकड़ माल।।