रविवार, 6 जून 2010

अपने झूठे अहंकार को मिटा दो......(सत्संग) पार्ट -१/३


परमात्मा हृदय में ही विराजमान है। लेकिन अहंकार बर्फ की सतह की तरह आवरण बनकर खड़ा है।

इस आवरण का भंग होते ही पता चलता है कि मैं और परमात्मा कभी दो न थे, कभी अलग न थे।

वेदान्त सुनकर यदि जप, तप, पाठ, पूजा, कीर्तन, ध्यान को व्यर्थ मानते हो

और लोभ, क्रोध, राग, द्वेष, मोहादि विकारों को व्यर्थ मानकर निर्विकार नहीं बनते हो तो सावधान हो जाओ।

तुम एक भयंकर आत्मवंचना में फँसे हो। तुम्हारे उस तथाकथित ब्रह्मज्ञान से तुम्हारा क्षुद्र अहं ही पुष्ट होकर मजबूत बनेगा।

आप किसी जीवित आत्मज्ञानी संत के पास जायें तो यह आशा मत रखना कि वे आपके अहंकार को पोषण देंगे।

वे तो आपके अहंकार पर ही कुठाराघात करेंगे। क्योंकि आपके और परमात्मा के बीच यह अहंकार ही तो बाधा है।

अपने सदगुरु की कृपा से ध्यान में उतरकर अपने झूठे अहंकार को मिटा दो तो उसकी जगह पर ईश्वर आ बैठेगा।

आ बैठेगा क्या, वहाँ ईश्वर था ही। तुम्हारा अहंकार मिटा तो वह प्रगट हो गया। फिर तुम्हें न मन्दिर जाने की आवश्यकता,

न मस्जिद जाने की, न गुरुद्वारा जाने की और न ही चर्च जाने की आवश्यकता,

क्योंकि जिसके लिए तुम वहाँ जाते थे वह तुम्हारे भीतर ही प्रकट हो गया।

निर्दोष और सरल व्यक्ति सत्य का पैगाम जल्दी सुन लेता है लेकिन अपने को चतुर मानने वाला व्यक्ति उस पैगाम को

जल्दी नहीं सुनता।

मनुष्य के सब प्रयास केवल रोटी, पानी, वस्त्र, निवास के लिए ही नहीं होते,

अहं के पोषण के लिए भी होते हैं।

विश्व में जो नरसंहार और बड़े बड़े युद्ध हुए हैं वे दाल-रोटी के लिए नहीं हुए, केवल अहं के रक्षण के लिए हुए हैं।

जब तक दुःख होता है तब तक समझ लो कि किसी-न-किसी प्रकार की अहं की पकड़ है।

प्रकृति में घटने वाली घटनाओं में यदि तुम्हारी पूर्ण सम्मति नहीं होगी तो वे घटनाएँ तुम्हें परेशान कर देंगी।

ईश्वर की हाँ में हाँ नहीं मिलाओ तब तक अवश्य परेशान होगे। अहं की धारणा को चोट लगेगी। दुःख और संघर्ष आयेंगे ही।

अहं कोई मौलिक चीज नहीं है। भ्रान्ति से अहं खड़ा हो गया है।

जन्मों और सदियों का अभ्यास हो गया है इसलिए अहं सच्चा लग रहा है।

अहं का पोषण भाता है। खुशामद प्यारी लगती है।

जिस प्रकार ऊँट कंटीले वृक्ष के पास पहुँच जाता है, शराबी मयखाने में पहुँच जाता है,

वैसे ही अहं वाहवाही के बाजार में पहुँच जाता है।

सत्ताधीश दुनियाँ को झुकाने के लिए जीवन खो देते हैं फिर भी दुनियाँ दिल से नहीं झुकती।

सब से बड़ा कार्य, सब से बड़ी साधना है अपने अहं का समर्पण, अपने अहं का विसर्जन।

यह सब से नहीं हो सकता। सन्त अपने सर्वस्व को लुटा देते हैं।

इसीलिए दुनियाँ उनके आगे हृदयपूर्वक झुकती है।

bapuji k satsang parvachan se.....
to be continued............
hariom ,
kamal hirani
dubai

अपरा एकादशी(०८-०६-२०१०) को...


युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है?

मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ । उसे बताने की कृपा कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आपने सम्पूर्ण लोकों के हित के लिए बहुत उत्तम बात पूछी है ।

राजेन्द्र ! ज्येष्ठ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार वैशाख ) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अपरा’ है ।

यह बहुत पुण्य प्रदान करनेवाली और बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है ।

ब्रह्महत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारनेवाला,

परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से निश्चय ही पापरहित हो जाता है ।

जो झूठी गवाही देता है, माप तौल में धोखा देता है,


बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता है और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है…

ये सब नरक में निवास करनेवाले प्राणी हैं ।

परन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सवेन से ये भी पापरहित हो जाते हैं ।

यदि कोई क्षत्रिय अपने क्षात्रधर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है

तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होने के कारण घोर नरक में पड़ता है ।

जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुनिन्दा करता है,


वह भी महापातकों से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है ।

किन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सदगति को प्राप्त होते हैं ।

माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हो,

उस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता है,

काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है,

गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है,

बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करनेवाला मानव जिस फल को प्राप्त करता है,

बदरिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है

तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण दान करने से

जिस फल की प्राप्ति होती है, ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है ।

‘अपरा’ को उपवास करके भगवान वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ।

इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है ।

हरिओम,
कमल हिरानी,
दुबई

शनिवार, 5 जून 2010

एक ....मछली......वाली ....श्री सुरेशानंद्जी महाराज का सत्संग




जिसके जीवन मे भगवान के नाम कि दीक्षा नही उसका जीवन सफ़ल नही हो सकता..

जिसको भगवान नाम मे रूचि नही , वो नर रूप मे पशु समान है..

किसी किसी को कोई विधि निषेध नही होते ,

जप कि क्या जरुरत है पूछते है….नही भाई साहब !..जप कि बहोत जरुरत है!!….

एक महिला नदी किनारे मछालिया पकड़ कर बेचती और अपना गुजरा करती..

उसकी सहेली थी जो मालन थी, फूलो की मालाये बनाकर गुजारा करती थी..

एक दिन मछली बेचने वाली को उसकी सहेली मालन मिल गयी तो दोनो फूल वाली मालन के घर चले गए..

बात करते करते खाना पीना खाते रात होने को आयी

तो मालन बहन को बोली यहा ही सो जाओ बहन ..

उसने अच्छे से फूलो की बाडी की तरफ से जहा हवा आती थी वहा

मछालिवाली बहन का बिछाना लगा दिया..

ता कि फूलो कि सुगंध आए और मछालिवाली बहन को अच्छी नींद आये..

लेकिन मछालिवाली बहन सो नही पाए…

फूल वाली बहन ने पूछा कि, “क्या हुआ?”..

मछालिवाली बहन बोली कि , ” मुझे बदबू आ रही है..!”…

जरा मेरी टोकरी मे कपडा होगा मछली का उसपर पानी छाटू ,

अपने पास रखू तो शायद मुझे नींद आ जाये…

तो फूल वाली बहन ने वोह मछालिकी बदबूवाला कपडा दिया

और उसे सूंघते हुये वोह मछालिवाली बहन सो गयी..

ऐसे ही कितनों को साधना की सुवास अच्छी नही लगती..

व्यर्थ कि बातो मे , गन्दी फिल्म देखने मे अपना जीवन तबाह कर देते है…

उसी के आदि हो जाते है….ये बदबू है इतना भी समझने का अवसर अपने आप को नही देते…

गुलाब को उठाओ तो सुगंध आएगी….




..सत्च्चितानंद स्वरुप भगवान का नाम गुरू से मिला हुआ नाम जपो तो कल्याण हो जाता है..


नाम मे इतनी शक्ति है..

हरिओम ...........

श्री सुरेशानंद्जी महाराज का सत्संग
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Friday,5th Oct07,
baksi -12 Km from Ujjain

हरिओम
कमल हिरानी,
दुबई

शुक्रवार, 4 जून 2010

बच्चे कल का भविष्य.....(बाल संस्कार केंद्र )





अपने बेटे बेटियों को बार बार नही टोके;

नही तो लुच्चे लफंगो के चक्कर मे आएंगे.

उनके अवगुण बार बार याद दिलाकर कोसो नही..

वो अपने अवगुण सुधरेंगे ऐसे उनके होसले बुलंद करो…

धीरे से समझाए कि , “तुम्हारे मे दोष नही ..

तुम तो निर्दोष आत्मा हो…दोष तो शरीर और मन मे आते है..

तुम तो मेरे लाल हो बेटे.

.थोडा ये गलती निकाल दो..”

ऐसे कहे के अपने बच्चो को मदत करो…

बेटे बेटी की गलती निकल जायेगी..

अलार्म से बच्चो को नही जगाये..

घर के बडो ने ये काम करना चाहिऐ कि प्यार से ,

स्नेह से सब को उठाए..”जागो मोहन प्यारे” ऐसे भगवान का नाम लेकर जगाये..

तो दिनभर ईश्वर का आनंद रहेगा…





(* सदगुरूदेव ने सत्संग के तुमुल ध्वनि के लाभ बताते हुए

संत तुलसीदास के और कबीर जी के दोहे गए..**

और कंठ मे ओमकार का जप करनेवाला भ्रामरी प्राणायाम २ बार सुबह और शाम करने को कहा…)


पूज्य श्री के सत्संग परवचन से...

देखा बापूजी हमारा तो ख्याल रखते है

साथ में हमारे बाद आने वाले हमारे बच्चो का भी कितना ख्याल रखते है

वाह बापू वाह...

जग में नही कोई ऐसा....मेरे बापू जेसा...

जय हो....

हरिओम्म्म्म्म्म्म्म्म् ...........

कमल हिरानी,दुबई

गुरुवार, 3 जून 2010

भगवान् नाचने लग गए...........





भगवान् को अपना मानेंगे तो प्रेम रस जागेगा..

.गोपियों को देखो,प्रेम रस था तो भगवान् नाचने लग गए...

भगवान् तो प्रेम के भूखे हैं...

प्रेम से कोई भी दे - पत्र, पुष्पम, भगवान् स्वीकार करते हैं...

जब भोजन करो तो कह दो - "ठाकुर जी! खा लियो"...

वास्तव में तो ठाकुर जी ही भोग लगावे...

मैं खा रिया हूँ, मैं खा रिया हूँ,

तेरा ठाकुर जी ना हो, तो तू खा के दिखा?

मुर्दे को बोलो - तू चबा के दिखा ,

बेटे...जीवन भर खा लिया, तो एक रोटी चबा के दिखा तेरे बाप कि ताक़त है तो?

ठाकुर जी खिलाये तभी खावे, फिर चाहे जाट हो चाहे उसका बाप हो, चाहे बनिया हो...:-)

तो जब भोजन करो ना, तो भगवान् को बोलो कि आपको भोग लगाऊं,

पोट तो थारो भरेगा, भक्ती कि भक्ती हो जायेगी और भोजन बन जायेगाप्रसाद..

.और भगवान् कहते हैं -प्रसादेय सर्व दुखानाम हानिरास्योप्जायेते।

॥बुद्धि में प्रसन्नता आएगी...भगवान् को भोग लगाओगे तो रस तो भगवत मय बनोगो ना,

ऐसा थोडे ही झगड़ा खोर रस बनोगो...

दीक्षा का महत्त्व बताते हे गुरुदेव ने कहा - भगवान् के नाम में बड़ी ताक़त है,

लेकिन दीक्षा के बाद वोह जागृत होता है...

हरि ॐ,

बापू जी ने यह भी पक्का करवाया था,

सदा दिवाली संत कि.........चारों पहर आनंद......अकल माता कोई उपजाया...... ...गिने इन्द्र को रंक...

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पूज्य बापूजी के सत्संग परवचन से....

वाह मेरे बापू केसे केसे समजाते हो ....

इतना सरल तरीका.....भक्ति करने का...

क्या कोई और इतनी सरलता से समजा सकता है...

वाह मेरे बापू आपकी लीला निराली...

जय हो...

हरिओम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्

नारायण नारायण नारायण नारायण

बुधवार, 2 जून 2010

सिन्धी सांइंयों का पंजा......


..एक सिन्धी साईं टोपणदास थे..

उन के चौथे बेटे की शादी हो गई..बहु ले आए..

नई बहु थी,तो बहु के हिस्से हल्की फुलकी सेवा थी…

टोपनदास थाली पर २ खटके लगावे तो माचिस ले जानी है..

३ खटके लगावे तो घी ले जाना है..

४ खटके लगावे तो रुई ले जाना है….

५ खटके लगावे तो माला ले जानी है..

ऐसा आपस में उन का समझोता था..ट्युनिंग थी…

उस जमाने में बेल नहीं थी..वो माला छोड़ के आई..

और कुछ चाहिए वो देके आई..इतने में कोई आया, “सेठ टोपणदास आहे?”

बहु बोलती है, ” वो रुई खरीद रहे दुकानपर…पेढ़ी पे है..”

टोपणदास को गुस्सा आया की अभी तो माला देकर गई..ऐसा कैसा करती है?


इतने में दूसरा आदमी आया, “सेठ टोपणदास आहे?”

बहु बोलती, “नहीं , वो अपनी बहु को डांट रहे..अभी नहीं मिलेंगे..”

(सेठ टोपणदास और भी नाराज हो गए बहु पर)

इतने में तीसरा आदमी आया, सेठ बड़े पेढीदार थे..

बहु बोली की, “वो मोची के पास गए है, चप्पल सिलने के लिए..”


अब तो टोपणदास की पुजाबुजा ऐसे ही हो गया..बार बार घड्याल को देखे..

सुबह ४ बजे से १० बजे तक पूजा में बैठते थे..लेकिन अभी तो टाइम नहीं हो रहा…बार बार घड्याल को लानत दे…

ये सिन्धी साईं का पंजा है ना वो मल्टी पर्पज है

प्रेम से , दोस्ती से करे तो “तू पांचो विकारों से तर जा !”

और गुस्से से, दुश्मनी से करे तो ,”तू पांचो विकारों में डूब मरो!”

ऐसा है पंजा ये सिन्धी सांइंयों का…

..तो टोपणदास बार बार घड्याल को लानत दे…‘लख ना लत ते….अभी १० नहीं बजता है..‘

तो झुलेलाल भगवान को ये दे..

गणपति को ये दे..

इस देव को पूजे..उस देव को पूजे….

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय…असी ना माना…‘ फिर घड्याल को देखे..

(टोपणदास का पूजा में मन नहीं लग रहा था..)मुश्किल से १० बजे! टोपनदास बाहर आए..


‘नंडी ओ नंडी‘ नंडी माना छोटी बहु..‘हेडा अच्‘ यहाँ आओ..


‘तेरी उमर घंडी आहे?’ तेरी उमर कितनी है?


बहु बोली, ‘मेरी उम्र का तो कोई पार नहीं..‘


‘अरे! तुजी उम्र का कोई पार नहीं?’


बहु बोली, ‘हजारो शरीर पैदा हुए , मरे..मई तो वो ही की वोही हूँ..


मेरी उमर का तो कोई पार नहीं …शरीर की उमर तो १८ साल २ महीने है!‘

टोपणदास बोले, ‘ठीक है लेकिन तू झूठ बोलना कब से सीखी?मैं तो पूजा के रूम में था..तुम झूठ क्यो बोली की पेढ़ी पर है‘

बहु बोली की, ‘गुस्ताखी माफ हो ससुर जी,

आप शरीर से तो पूजा के रूम में थे लेकिन आप का मन पेढ़ी पर था..

मैंने ऐसा बोल दिया तो आप मुझ पर नाराज हो गए..

और वो चप्पल वाली बात इसलिए कही की मेहमान के सामने मोची ने ज्यादा पैसे ले लिए तो

आप ने इज्जत बचने के लिए दे दिए..

लेकिन पूजा के रूम में विचार कर रहे थे की आज पोते की चप्पल सिला के मोची के बच्चे का हिसाब वसूल करूँगा..‘

टोपणदास बोले, ‘नंदी..ये सब कहा से जान गई?मैं ४० साल से साधना करता हूँ..

मेरे को पता नहीं चला..तू कैसे समज जाती ये‘

बोले, ‘ मनमानी भक्ति, श्रध्दा अपने ढंग की होती और गुरु की दीक्षा वाली साधना अपने ढंग की है..

श्रध्दा के साथ बुध्दी योग उपसिती..बुध्दी से भगवत तत्व की उपासना करनेवाली दीक्षा मिलनी चाहिए..‘

ऐसा भगवान ने गीता में भी कहा है..



टोपणदास उस के मुख से ऐसी सत्संग की बातें सुनकर दंग रहे गए…

मैं ४० साल से साधना में बैलगाडी में घूम रहा हूँ..

तू शादी के २ महीने पहिले दीक्षा ली समर्थ गुरु की और इतनी आगे निकल गई..!‘




जो समर्थ गुरु में भी दोष देखते वो बड़े साधू- साध्वी होने के बाद भी गिर पड़ते है..लेकिन सदगुरू में सदगुरू तत्व देखते है तो उस का बेडा पार हो जाता है..बड़े बड़े गिर जाते है..

गुरु को माने मानवी, देखे देह व्यवहार l

कहे प्रीतम संशय नहीं, पड़े नरक के झार ll



गुरु को अगर देह धारी मान कर गुरु में अगर मनुष्य बुध्दी किया तो गिर जाएगा..लेकिन गुरु से दीक्षा लेकर ईमानदारी से गुरु से वफादार रहा तो बेडापार हो जाता…


टोपणदास बहोत प्रभावित हुए..कुलमिलाकर गुरु की कृपा के बिना असंभव है..कितना भी आदमी कितना भी कुछ कमाए ..धन कमाए लेकिन आत्मसंतोष के बिना जीवन पशु जैसा है….

तो वे लोग धनभागी है जिन को सत्संग मिलता है..उस से दुगुने चौगुने वो धनभागी है जिन को ब्रम्हज्ञानी गुरु का सत्संग मिलता है और उस से १००० गुना वे धनभागी है जिन को ब्रम्हज्ञानी गुरु से दीक्षा मिलती है…

और करोड़ गुना वे धनभागी है जिन की गुरु में श्रध्दा टिकी है..

..नहीं तो कुछ अभागे दीक्षा तक पहुंचते लेकिन ऐसा वैसा सुनकर गिर पड़ते…

तो कबीर जी बोलते,

प्रभु रस ऐसा जैसे लम्बी खजूर l

चढ़े तो चखे प्रेमरस, पड़े तो चकनाचूर ll

bapuji k satsang parvachan se.....

अरे समझ रखने वालो अब तो समझ जाओ....

इतना सिखाते है मेरे बापू.....

इतना ज्ञान कही नही मिलेगा ....

आओ बापूजी की शरण में...

और पा लो सच्चा ज्ञान ....जय हो....


ॐ शान्ति.


हरि ॐ!सदगुरुदेव जी भगवान की जय हो!!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे…

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मंगलवार, 1 जून 2010

सच का साथ.........(किसान की जमीन)सत्संग



एक किसान को पैसे कि जरुरत पड़ी तो उसने साहूकार से कर्जा लिया

और अंगूठा कर दिया..साहूकार ने एक मिण्डी बढ़ा दी..

५ के ५० हो गए..

रामानंद ने किसान की जमीन हड़प करने के लिए खुदीराम को कहा कि ,

तुम गवाही दो…खुदीराम बोला झूठी गवाही नही दूंगा.

.रामानंद ने डराया धमकाया- ऐसा रगड़ा दूंगा..

जीना मुश्किल कर दूंगा…लेकिन खुदीराम ने झूठी गवाही नही दी…

खुदीराम को रामानंद ने इतना सताया कि उसको

अपना देरेगांव छोड़कर ननिहाल मे जाके रहना पड़ा….

जो देरेगांव से कई मिल दूर था तमारपुर…

सच के साथ रहने से तकलीफ तो हुयी …

रामानंद को लगा कि, मैं जित गया ..

लेकिन ऐसा हुआ कि , रामानंद खुद बिमारियोंसे घिरा ,

पत्नी पागल होके मर गयी ..बेटी लोफरो के साथ भाग गयी

और बेटा आवारा हो गया…

लेकिन खुदीराम के घर ईश्वर ने रामकृष्ण परम हंस का आत्मा प्रगट किया….!


मैं आया उसके पहले सौदागर के हाथो मेरे पिताजी के घर झुला भेजा कैसा खयाल करता है वो ईश्वर…!!

gurudev k satsang parvchan se.....

sadho sadho ............

waah bapu waah.........

kese kese samjate ho....

aapki lila nirali....

jai ho....