गुरुवार, 31 मई 2012

Nirjala Ekadashi Vrat Katha(Story) (31 may 2012 to 1st june 2012)




(note  : कृपया इस दिन पानी भी न पिए.... और उपवास रखे .....
और अगर उपवास नही कर सकते तो कृपा करे अपने उपर ...कम से कम चावल तो गलती से भी न खाए)


 

निर्जला एकादशी


युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये

भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं

तब वेदव्यासजी कहने लगे: दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन करे द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए

यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : भीमसेन ! तुम भी एकादशी को खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन करना

भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा

व्यासजी ने कहा: भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं

कुन्तीनन्दन ! निर्जला एकादशीके दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशीका व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :

देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

संसारसागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीके ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया तबसे यह लोक मे पाण्डव द्वादशीके नाम से विख्यात हुई




बुधवार, 16 मई 2012

अपरा एकादशी (16/05/2012)



अपरा एकादशी

युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती हैमैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ  उसे बताने की कृपा कीजिये 

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आपने सम्पूर्ण लोकों के हित के लिए बहुत उत्तम बात पूछी है  राजेन्द्र ! ज्येष्ठ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार वैशाख ) मास केकृष्णपक्ष की एकादशी का नाम अपरा’ है  यह बहुत पुण्य प्रदान करनेवाली और बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है  ब्रह्महत्या से दबा हुआगोत्र की हत्या करनेवाला,गर्भस्थ बालक को मारनेवालापरनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी अपरा एकादशी’ के सेवन से निश्चय ही पापरहित हो जाता है  जो झूठी गवाही देता हैमाप तौल मेंधोखा देता हैबिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता है और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है… ये सब नरक में निवास करनेवाले प्राणी हैं परन्तु अपरा एकादशी’ के सवेन से ये भी पापरहित हो जाते हैं  यदि कोई क्षत्रिय अपने क्षात्रधर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होनेके कारण घोर नरक में पड़ता है  जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुनिन्दा करता हैवह भी महापातकों से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है  किन्तु अपराएकादशी’ के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सदगति को प्राप्त होते हैं 

माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित होउस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता हैकाशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है,गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता हैबृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करनेवाला मानवजिस फल को प्राप्त करता हैबदरिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समयकुरुक्षेत्र में दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथीघोड़ा और सुवर्ण दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है अपरा’ को उपवास करके भगवान वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है  इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान काफल मिलता है 


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बुधवार, 7 मार्च 2012

आओ खेलें ज्ञान की होली


आओ खेलें ज्ञान की होली

आओ खेलें ज्ञान की होलीराग-द्वेष भुलायें,
समता-स्नेह बढा‌ के दिल मेंप्रेम का रंग लगायें

नहीं उछालें कीचड-मिट्टीना अपशब्द बुलायें
रंग पलाश से होली खेलेंना गंदे रंग लगायें

नहीं पियें हम भाँग और मदिरापंचामृत बनायें
जिससे रहे मन में प्रसन्नताऐसा प्रसाद खायें

ठाकुर जी को भोग लगा केअतिथि को भी खिलायें
आयी बसंत में प्यारी होलीआनंद-आनंद छाये

गुरूद्वार की न्यारी होलीपरमानंद लुटाये
जैसे कहते सदगुरु प्यारेवैसी होली मनायें

गुरुज्ञान में गोते लगाकरनिज़ को सहज बनायें
गुरुआज्ञा में शीश झुकाकरगुरुसेवा अपनायें
गुरु रंग में जीवन रँगा केआत्मज्ञान को पायें

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

चंद्रग्रहण तिथि – 10 दिसम्बर 2011, शनिवार

चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण में पालन करने योग्य बातें

चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण में पालन करने योग्य बातें


चंद्रग्रहण तिथि – 10 दिसम्बर 2011, शनिवार
सूतक काल – सुबह 9:15 से ग्रहण समाप्त होने तक,
ग्रहण काल - शाम 6:15 से रात्रि 9:48 तक,








सूतक काल –
अंतरिक्ष प्रदुषण के समय को सूतक काल कहा जाता है। सूर्यग्रहण में सूतक 12 घ्ंटे पहले और चंद्रग्रहण में सूतक 9 घंटे पहले लगता है । सूतक काल में भोजन तथा पेय पदार्थों के सेवन की मनाही की गयी है तथा देव दर्शन वर्जित माने गये हैं ।
हमारे ऋषि मुनियों ने सूर्य चन्द्र ग्रहण लगने के समय भोजन करने के लिये मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं । इसलिये ऋषियों ने पात्रों में क़ुश अथवा तुलसी डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जायें और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है, ताकि कीटाणु मर जायें।
जीव विज्ञान विषय के प्रोफेसर टारिंस्टन ने पर्याप्त अनुसन्धान करके सिद्ध किया है कि सूर्य चन्द्र ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है ।


ग्रहण काल में न करने योग्य बातें :-

1. ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्‍याग करना, सोना, केश विन्‍यास करना, रति क्रीडा करना, मंजन करना, वस्‍त्र नीचोड़्ना, ताला खोलना, वर्जित किए गये हैं ।
2. ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है, लघुशंका करने से घर में दरिद्रता आती है, मल त्यागने से पेट में कृमि रोग पकड़ता है, स्त्री प्रसंग करने से सूअर की योनि मिलती है और मालिश या उबटन किया तो व्यक्ति कुष्‍ठ रोगी होता है।
3. देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी,  काना और दंतहीन होता है।
4. सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्रग्रहण में तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए (1 प्रहर = 3 घंटे) । बूढ़े, बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व खा सकते हैं ।
5. ग्रहण के दिन पत्‍ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ना चाहिए
6. 'स्कंद पुराण' के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है ।
7. ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।
8. ये शास्‍त्र् की बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता।


ग्रहण काल में करने योग्य बातें:-
1. ग्रहण लगने से पूर्व स्‍नान करके भगवान का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए ।
2. भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। यदि गंगा जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।
3. ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम जप अवश्य करें,  न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है।
4. ग्रहण समाप्‍त हो जाने पर स्‍नान करके ब्राम्‍हण को दान करने का विधान है ।
5. ग्रहण के बाद पुराना पानी, अन्‍न नष्‍ट कर नया भोजन पकाया जाता है, और ताजा भरकर पीया जाता है।
6. ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए।
7. ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए।
8. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्‍न, जरूरत मंदों को वस्‍त्र् दान देने से अनेक गुना पुण्‍य प्राप्‍त होता है।


गर्भवती स्त्रियों के लिये विशेष सावधानी – 
गर्भवती स्त्री को सूर्य – चन्‍द्रग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्‍योकि उसके दुष्‍प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है । इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें।
ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है, और किसी वस्‍त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है । क्‍योंकि ऐसी मान्‍यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं  या फिर सिल (जुड़) जाते हैं ।


ग्रहण के समय मंत्र  सिध्दि :-
1.   ग्रहण के समय “ ॐ ह्रीं नमः” मंत्र का 10 माला जप करें इससे ये मंत्र् सिध्‍द हो जाता है । फिर अगर किसी का स्‍वभाव बिगड़ा हुआ है, बात नहीं मान रहा है, इत्‍यादि । तो उसके लिए हम संकल्‍प करके इस मंत्र् का उपयोग कर सकते हैं ।
2.  ग्रहण के समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहण शुद्ध होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणाशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाकसिद्धि प्राप्त कर लेता है।





ग्रहण के समय ः-  
1 ग्रहण के सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए।
2 ग्रहण के समय मूत्र् – त्‍यागने से घर में दरिद्रता आती है ।
3 शौच करने से पेट में क्रीमी रोग पकड़ता है । ये शास्‍त्र् की बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता।
4 ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी मिलती है ।
5 ग्रहण के समय किसी से धोखा या ठगी करने से सर्प की योनि मिलती है ।
6 जीव-जन्‍तु या किसी की हत्‍या करने से नारकीय योनी में भटकना पड़ता है ।
7 ग्रहण के समय भोजन अथवा मालिश किया तो कुष्‍ठ रोगी के शरीर में जाना पड़ेगा।
8 ग्रहण के समय बाथरूम में नहीं जाना पड्रे ऐसा खायें।
9 ग्रहण के दौरान मौन रहोगे, जप और ध्‍यान करोगे तो अनन्‍त गुना फल होगा।